आखिर क्यों फीकी पड़ी मोती महल की चमक

लखनऊ। अवध के नवाब सआदत खां ने 18वीं शताब्दी में लखनऊ में कई खूबसूरत इमारतों का निर्माण कराया था। जिनमें छतर मंजिल, मोती महल के नाम शामिल है।


बेग़म की याद में नवाब ने बनवाया

इतिहासकार रवि भट्ट बताते हैं कि सहादत खां अवध के छठे नवाब थे। उन्होंने अपनी बेगम के लिए यह महल बनवाया था। सआदत अली खां को अपनी बेगम टाट महल से बेहद प्यार था। सआदत अली खां ने मोती महल इन्हीं के लिए बनवाया था। नवाब के गुजरने के बाद टाटमहल बावली वाले मकान में जाकर रहने लगीं। 


नवाब छत से देखते से जानवरों की लड़ाई

बताया जाता है कि 1857 की गदर के बाद मोती महल में तबाही का मंजर नजर आने लगा, जिसके बाद इसकी सुंदरता खत्म हो गई थी। बाद में इस इमारत का जीर्णोद्धार हुआ, जिससे इसकी बनावट में परिवर्तन हो गया। नवाब सआदत अली खां ने मोती महल के पीछे गोमती पर किश्तियों का एक पुल बनवाया था। मोती महल के पश्चिम में शाह बनी थी, जिसके अहाते में छोटे-मोटे जानवरों की लड़ाई देखी जाती थी। बादशाह शाह मंजिल की छत से अपने दोस्तों के साथ इस लड़ाई को देखा करते थे। सामने वाले मैदान को हजारी बाग कहा जाता था।

अब ट्रस्ट के हवाले हैं मोती महल

वर्तमान में मोती महल को मोतीलाल नेहरू मेमोरियल सोसाइटी, भारत सेवा संस्थान नामक ट्रस्ट के कार्यालय खुले हुए हैं। वहीं, मोती महल के बाई तरफ अहाते में ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त की समाधि बनी हुई है।

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