‘मातृभूमि’ के लिए राणा सांगा के साथ बाबर से भिड़ गया यह मुसलमान राजा

राणा सांगा के साथ मैदान में संभाला मोर्चा, युद्धभूमि में सीने पर खाया तोप का गोला

नई दिल्ली। बलिदान की माटी यानी राजस्थान। वीरता की अप्रतिम गाथा यानी राजस्थान। राजस्थान वीर सपूतों की भूमि है। राणा संगा की वीरता की गाथा आज भी कही, सुनी और गायी जाती है। लेकिन, आज हम आपको राजस्थान के ऐसे वीर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिससे बाबर भी घबराता था। उस महान राजा का नाम था हसन खां मेवाती। मेवती अलवर राजधानी के राजा थे।

देश की खातिर दिया हिन्दुओं का साथ
अमर शहीद राजा हसन खां मेवाती नाम की किताब लिखने वाले इतिहासकार सद्दीक मेवा लिखते हैं कि हसन खां मेवाती सोलहवीं शताब्दी के महान देश भक्त राजा थे। अकबरनामा में उस समय के जिन चार योद्धाओं का वर्णन है, उनमे से हसन खां मेवाती एक हैं। राजा हसन खां मेवाती ने कभी विदेशी अतिक्रमणकारियों को साथ कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने देश की खातिर हिंदू राजाओं का साथ दिया था। इनके खानदान ने मेवात पर 200 साल राज किया।

सांगा का दिया साथ
हसन खां ने बाबर के खिलाफ युद्ध में राणा सांगा का साथ दिया। हसन खां ने बाबर को कहा था, ‘मेरे लिए धर्म से मेरा मुल्क पहले है और यही मेरा ईमान है’।

देशभक्ति की मिसाल थे मेवाती
हसन खां मेवाती वतन परस्ती की मिसाल थे। हसन खां मेवाती भारत माता के वो सच्चे सपूत थे, जिन्होंने बाबर को रोकने के लिए अपने राज्य की कुर्बानी तक दे दी। एक दिन मेवाती को बाबर का पैगाम मिला, उसमें बाबर ने मजहब की दुहाई देते हुए उससे मिलने का प्रस्ताव दिया। बाबर ने इसके साथ मेवाती को कई और लालच दिए, लेकिन मेवाती ने उनका पैगाम ठुकराकर देशभक्ति को चुना। इसके बाद बाबर ने धमकी देना शुरु किया, बाबर ने लिखा कि मैं तुम्हारे पुत्र को रिहा कर दूंगा, तुम मेरे से आकर मिलो, इसपर मेवाती ने जवाब दिया कि अब हमारी मुलाकात युद्ध के मैदान में होगी।

कौन होते है खानजादा
फिरोज तुगलक के समय में बहुत से राजपूत खानदानों ने इस्लाम धर्म कबूल किया था। उनमें सरहेटा राजस्थान के ‘राजकुमार समरपाल’ थे। समरपाल की पांचवीं पीढी में सन् 1492 में हसनखां के पिता ‘अलावल खां’ मेवात के राजा बने। इसलिये हसन खां ‘जादू गौत्र’ से ताल्लुक रखते हैं और मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद खान जादू एवं खानजादा कहलाए। हसन खां सन् 1505 में मेवात के राजा बनें। सन् 1526 ईसवीं में जब मुगलबादशाह बाबर ने हिंदुस्तान पर हमला किया तो इंब्राहीम लोदी, हसन खां मेवाती व दिगर राजाओं ने मिलकर पानीपत के मुकाम पर बाबर से हुऐ मुकाबले में निडर होकर सामना किया। जिसमें राजा हसन खां के पिता अलावल खां शहीद हो गए।

बाबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया
पानीपत की विजय के बाद बाबर ने दिल्ली और आगरा पर तो अपना अधिकार जरूर कर लिया लेकिन भारत सम्राट बनने के लिये उसे महाराणा संग्राम सिंह (मेवाड) और हसन खां (मेवात) बाबर के लिये कडी चुनौती के रूप में सामने खडे थे। बाबर ने हसन खां मेवाती को अपने साथ मिलाने के लिये उन्हें इस्लाम का वास्ता दिया तथा एक लडाई में बंधक बनाये गये राजा हसन खा के पुत्र को बिना शर्त छोड दिया, लेकिन राजा हसन खां की देश भक्ति के सामने धर्म का वास्ता काम नहीं आया।

सांगा के साथ संभाला मोर्चा और पाई वीरगति
राजा हसन खां ने राणा सांगा के साथ मिलकर ‘खानवा’ के मैदान में बाबर की सेना से दो-दो हाथ किये। अचानक एक तीर राणा सांगा के सिर पर आ लगा और वह हाथी के ओहदे से नीचे गिर पडे। जिसके बाद सैना के पैर उखडने लगे तो सेनापति का झण्डा खुद राजा हसन खां मेवाती ने संभाल लिया और बाबर सेना को ललकारते हुऐ उन पर जोरदार हमला बोल दिया। राजा हसन खां मेवाती के 12 हजार घुडसवार सिपाही बाबर की सेना पर टूट पडे। इसी दौरान एक तोप का गोला राजा हसन खां मेवाती के सीने पर आ लगा और इसके बाद आखरी मेवाती राजा का हमेशा के लिये 15 मार्च 1527 को अंत हो गया।

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