राजनीति, दंगे और दल

अमर भारती : 1984 की भयावह त्रासदी के बाद हाल ही में एक बार फिर से देश की राजधानी दिल्ली दंगों की आग में झुलसती नजर आई। आज तक हुए अधिकांश दंगों की पृष्ठभूमि पर यदि नजर डाली जाए तो इसके पीछे कहीं न कहीं से राजनीति और राजनीतिक दलों का स्वार्थ नजर आता है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे का मामला संसद में उठा और उस पर भारी हंगामा हुआ। एक तरफ दंगे में हुई हिंसा और बर्बादी के दृश्य देखकर हमारा दिल दहल रहा है, दूसरी तरफ नेता इस पर सियासी रोटियां सेंकने में जुटे हैं। हिंसा प्रभावित लोगों से जिसका वास्तविक सरोकार होगा, उसका आचरण बिल्कुल अलग होगा। वह लोगों के बीच जाएगा, उनकी आपबीती सुनेगा, समस्याएं जानेगा और उन्हें दूर करने के साथ लोगों में सुरक्षा का भाव पैदा करने की हरसंभव कोशिश करेगा। लेकिन आप नजर उठा लीजिए, संसद में हंगामा और बाहर बयानबाजी करने के अलावा कोई भी नेता प्रभावित इलाकों में जाने के लिए तैयार नहीं है।

पुलिस का यह बयान केवल औपचारिकता भर है कि स्थिति नियंत्रण में है, कहीं भी हिंसा की कोई वारदात नहीं हो रही। स्थिति नियंत्रण में होना और शांति स्थापित होना, दोनों में मौलिक अंतर है। नियंत्रण आप शक्ति के भय से स्थापित करते हैं जबकि शांति तथा सद्भाव गिले-शिकवे दूर कर आपस में गले मिलने से पैदा होता है। यह भूमिका पुलिस नहीं निभा सकती। ऐसी विकट स्थितियों में सामाजिक-धार्मिक संगठनों की भी सीमित भूमिका ही होती है। इसमें मूल भूमिका राजनीति की होती है। हमारी राजनीति आज इस अवस्था में नहीं है कि वह इतनी सरल और स्वाभाविक बात को समझकर उसके अनुसार काम कर सके।

केंद्र सरकार को हिंसा के लिए जि मेवार ठहराना बिल्कुल आसान है। यह ठीक है कि दिल्ली पुलिस के लोग भी हिंसा का शिकार हुए और इसका अर्थ है कि उन्होंने दंगाइयों का मुकाबला करने की कोशिश की। लेकिन पुलिस की आर िभक भूमिका काठ के उल्लू की तरह थी। निवर्तमान पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक पूरे दंगे के दौरान कहीं नजर ही नहीं आए। उनकी ऐसी शर्मनाक भूमिका स्वयं जांच का विषय है।दिल्ली पुलिस ने यदि केवल चारों ओर से आ रही सहायता कॉल का ही मूल्यांकन कर केंद्र से आपातस्थिति में अतिरिक्त पुलिस बल की मांग की होती और 24 फरवरी की सुबह तक भी क र्यू लगाने और देखते ही गोली मारने का आदेश जारी किया होता तो जन-धन की इतनी बड़ी क्षति नहीं होती। ऐसा लगता ही नहीं कि हमारे राजनीतिक नेतृत्व का इससे कोई लेना-देना भी है।

दिल्ली सरकार के पास कानून और व्यवस्था की जि मेवारी नहीं है, लेकिन यहां के नागरिकों के प्रति उसका कुछ तो दायित्व है। जीटीबी अस्पताल में सबसे ज्यादा घायल और मृतक आए। वहां अव्यवस्था और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा थी। दिल्ली सरकार ने इतनी व्यवस्था भी नहीं की कि शवों के पोस्टमार्टम और उन्हें रिश्तेदारों को सौंपे जाने की औपचारिकता कम कर दी जाए। क्या दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री की जि मेवारी नहीं थी कि एक-दो दिनों के लिए अपने प्रमुख अधिकारियों के साथ अस्पताल में ही कैंप कर दें? इसका मतलब आप बयान तो देते रहे, लेकिन क्या करना चाहिए इसकी कोई सोच ही नहीं थी।

अब क्षतिपूर्ति राशि की घोषणा हो गई है, लेकिन प्रशासन लोगों तक पहुंचे, उनकी पीठ पर हाथ रखे, उनको स्वयं अंतरिम सहायता राशि प्रदान करे, इसका प्रबंध नहीं है। न दंगों के दौरान बड़े नेता जनता के बीच में दिखे और न उसके बाद कहीं दिख रहे हैं। इस समय सारी पार्टियां लड़ रही हैं। कोई पार्टी कहे कि दंगों में उनके लोगों की भूमिका नहीं थी तो यह बिल्कुल सही नहीं होगा। जब दंगे होते हैं तो फिर पार्टियों की दीवारें नहीं रहतीं। कम से कम अब तो राजनीतिक दलों के नेता लोगों के बीच जाएं। उनकी समस्याओं को समझें, उनका निदान करने की कोशिश करें। इसकी जगह एक-दूसरे पर आरोप लगाने का अर्थ है कि किसी की अभिरुचि शांति स्थापित करने में है ही नहीं। जिस तरह से राजनीतिक मोर्चाबंदी हो रही है वह पीडि़तों के ज म कुरेदने जैसा है। फिलहाल तो लगभग सभी दल दंगों पर घडिय़ाली आंसू बहाते हुए एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए स्वयं को टीवी चैनलों पर पाकसाफ बताते नहीं थक रहे हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एक बार फिर वोट बैंक निष्ठा और दलीय निष्ठाएं राष्ट्रीय और मानवीय निष्ठा पर भारी पड़ रही है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध

रेलवे में महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े यकीनन चिंताजनक है। सूचना अधिकार के तहत मिली जानकारी बता रही है कि रेलवे परिसर और रेल की यात्रा भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। 2017 से 2019 के बीच महिलाओं के खिलाफ रेलवे में 1672 आपराधिक घटनाएं हुई जिनमें 802 रेलवे परिसर तथा 870 रेलों में हुई। इस दौरान रेप के 165 मामले सामने आए। इनमें 136 मामले रेलवे परिसर तथा चलती रेलों में 29 रेप के मामले सामने आए। सामान्य कल्पना से परे है कि चलती रेल या रेलवे परिसर, जहां लोगों की सं या काफी रहती है, में रेप हो जाए। दर्ज मामलों के अनुसार 2017 में 51, 2018 में 70 तथा 2019 में 44 महिलाओं के साथ रेप को अंजाम दिया गया। इसका वर्गीकरण करें तो 2019 में 36 रेलवे परिसर में तो आठ चलती रेलों में रेप हुए। इसी तरह 2017 में 41 परिसर तथा 10 चलती रेलों में तथा 2018 में 59 रेलवे परिसर में तथा 11 चलती रेलों में हुए।

ध्यान रखिए, ये वे मामले हैं जो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हैं। कितने ही मामले होंगे जिनकी शिकायत पुलिस के पास पहुंचती ही नहीं होगी। रेल यात्रियों की सुरक्षा एवं संरक्षा सरकारें हमेशा प्राथमिकता में होने की बात करती रही हैं। इन तीन वर्षो के दौरान ही रेलवे परिसर एवं चलती रेलों में अपहरण के 771 ममले, लूटपाट के 4718, हत्या के प्रयास के 213 तथा हत्या के 542 मामले हुए। ये सामान्य अपराध हैं। लूटपाट आदि तो सामूहिक रूप से होती हैं पर महिलाओं के साथ यौनाचार किसी अकेली के साथ होता है। इसकी रोकथाम विचार का विषय होना चाहिए।

वैसे अपराध की रोकथाम, मामले दर्ज कर जांच तथा कानूनी कार्रवाई की जि मेवारी संबंधित राज्य सरकारों की होती है, जहां से अपराध के समय रेल गुजर चुकी होती हैं। इसके लिए राजकीय रेलवे पुलिस या जीआरपी होती है। हालांकि जैसा सरकार ने पिछले दिनों बताया था महिलाओं की सुरक्षा के लिए रेलवे ने अपनी ओर से भी कुछ व्यवस्थाएं की हैं। जोखिम वाले और पहचान किए गए मागरे या खंडों में औसत 2200 रेलों में रेलवे सुरक्षा बल या आरपीएफ के जि मे भी सुरक्षा दी गई है। हमारा मानना है कि रेलवे परिसर या चलती रेलों में महिलाओं के खिलाफ किसी तरह का यौनाचार संगीन अपराध का विषय तो है ही, यह रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता का भी द्योतक है।

अध्ययन

‘लव हार्मोनट पर निर्भर करती है बदला लेने की इच्छा

क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई आप पर हमला करता है या चुभने वाली कोई बात कहता है तो अचानक ऐसा क्या हो जाता है जिससे आप आग बबूला और बदला लेने के लिए आतुर हो जाते हो।  दरअसल इन सबके पीछे आपका पूरा मस्तिष्क तंत्र काम कर रहा होता है। एक अध्ययन के अनुसार, संघर्ष में उलझे लोगों में ‘लव हार्मोन ऑक्सीटोसिन का स्तर बढ़ सकता है और यह निर्णय लेने की गतिविधि से जुड़े मस्तिष्क के तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इस अध्ययन में उन तथ्यों पर अधिक प्रकाश डाला गया है जिससे लोग प्रतिशोध की आग में जल उठते हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि हार्मोन का स्तर बढऩे से एक समूह के बीच प्यार और हमदर्दी की भावना बढ़ती है और साथ ही जब कोई बाहरी समूह हमला करता है तो बदला लेने की इच्छा भी बढ़ जाती है। चीन के पेकिंग विश्वविद्यालय समेत शोधकर्ताओं का अध्ययन यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि जब कोई झड़प कुछ लोगों के बीच शुरू होती है तो वह पूरे समुदायों तक कैसे फैल जाती है। पेकिंग विश्वविद्यालय के अध्ययन के मु य लेखक शियाओचुन हान ने कहा, ”झड़प के दौरान किसी हमले का बदला लेने की इच्छा सभी मनुष्यों में होती है लेकिन इसके पीछे की न्यूरोबायोलॉजिकल प्रक्रिया अब भी स्पष्ट नहीं है। पूर्व के अध्ययनों के आधार पर उन्होंने कहा कि ऑक्सीटोसिन किसी समूह में हमदर्दी की भावना में भूमिका निभाता है और अंतर समूह संघर्ष को नियंत्रित करता है।