दंगा पीडि़तों के लंबित मामलों को तीन महीने में निपटाने का आदेश

दंगा पीड़तों को जल्द निपटाने का आदेश

नई दिल्ली। उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने उत्तर- पूर्वी दिल्ली के दंगा पीडि़तों के बड़ी संख्या में लंबित दावों के मद्देनजर 40 और आकलनकर्ताओं की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है और सभी लंबित मामलों को तीन महीने के भीतर निपटाने के निर्देश दिये हैं। उपराज्यपाल कार्यालय के अधिकारियों ने कहा कि उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगा दावा आयोग (एनईडीआरसीसी) की सहायता के लिए 14 आकलनकर्ता हैं, जिसने अब तक फरवरी 2020 के दंगों के पीडि़तों द्वारा दायर किए गए कुल 2,775 दावों में से केवल सात प्रतिशत (200) का निपटारा किया है। ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अधिकांश हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया था, जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और सैकड़ों लोग घायल हो गए थे। इसके अलावा तीन दिनों तक हिंसा, आगजनी और लूटपाट के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति का भारी नुकसान हुआ था।


गौरतलब हैं कि दिल्ली दंगा के पीडि़तों को केजरीवाल सरकार ने रिकॉर्ड समय में मुआवजा दे दिया है। दिल्ली सरकार की ओर से 2221 दंगा पीडि़त परिवारों और संपत्तियों के मद में हुए नुकसान की भरपाई के तौर पर 26 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया। सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि मान रही है और दावा किया जा रहा है कि पहली बार इतनी जल्दी मुआवजे का वितरण किया गया। अभी भी 1984 के दंगा पीडि़त मदद के लिए भटक रहे हैं। फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में दिल्ली में दंगा भड़क गया था। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हिंसा प्रभावित मौजपुर और जाफराबाद सहित अन्य क्षेत्रों में हालात का जायजा लेने के बाद हरसंभव मदद का भरोसा भी दिया था। दंगा प्रभावित इलाकों से कई परिवार अपने घरों को लोग डर के मारे अपना घर छोड़ कर सुरक्षित स्थान पर चले गए थे, जबकि कुछ लोग बेघर हो गए थे।

चंद दिनों बाद ही लोगों से वापस लौटने की अपील की गई थी। मिली जानकारी के अनुसार राजधानी के इतिहास पर दंगों का जो दाग लगा था उसकी यादें अब तक ताजा हैं। दंगों की आग में झुलसी उत्तर-पूर्वी दिल्ली के रहने वाले सैकड़ों परिवारों में किसी ने अपना आशियाना गंवाया तो किसी को जान की कुर्बानी देनी पड़ी। कई के सुहाग उजड़ गए, कई ने अपने बेटे खो दिए। कई परिवार ऐसे भी हैं, जिनका मुखिया दंगों की भेंट चढ़ गया और आज उस घर में कमाने वाला तक नहीं है। वह खौफनाक मंजर रह-रहकर पीडि़तों के घाव को आज भी हरा कर जाता है। दिलों-दिमाग में तनाव और चेहरे पर दंगे का डर साफ नजर आता है।