ऐ मौत..! तूने उसे ज़मींदार कर दिया…

| सुमंगल दीप त्रिवेदी :

आज उसे कोई ज़ल्दी नहीं है कि उसे कोई ‘शो’ करना है। आज कोई रिटेक नहीं है। अब तो दुनियाबी लाइव का भी उसे कोई टेंशन नहीं। उसने तो आज सुकूँ की वह चादर ओढ़ ली, जिसे लोग ‘मौत’ कहते हैं।

लेकिन, आज एक चीज़ वह कहीं ऊपर नभमंडल से ज़रूर देख रहा होगा कि, आख़िर मौत ने उसे ज़मींदार कर दिया। देश के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री तक, रक्षामंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक, शिक्षाविदों से लेकर साहित्यकारों तक, सबने उसे भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।

आज, पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले बच्चों के व्हाट्सएप स्टेटस से लेकर फेसबुक प्रोफाइल पिक्चर तक ‘रोहित सरदाना’ छाये हुए हैं। दरअसल, यही वो कमाई है, जिसको कमाने में लोगों की पीढियां बीत जाती हैं।

मुझे एक वाक्या याद आता है। बात अभी दो साल पहले यानी वर्ष 2019 के जून महीने की है। रविवार का दिन था। दिल्ली के एक प्रसिद्ध ऑडिटोरियम में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। रोहित जी भी वहां बतौर विशिष्ट अतिथि पधारे थे। उनको सुनने के लिए कई प्रतिष्ठित लोग आये हुए थे। मुद्दा था, ‘पत्रकारिता और युवा’। जब रोहित जी ने बोलना शुरू किया तो पूरे ऑडिटोरियम में पिन ड्रॉप साइलेंस छा गया था। कुछ देर बाद जब उन्होंने लोगों से कुछ पूछा तो चुप्पी टूटी।

उनके बोलने के अंदाज़ ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। विषय को रोचक रखने के साथ तार्किकता का सामंजस्य लेकर करीब सवा घण्टा तक लगातार वो बोलते रहे और युवा कलमकार, पत्रकार या यूं कहें कि इस दुनिया में उतरने वाले नए योद्धा तो उन्हें डायस से जाने ही नहीं देना चाहते थे।

पूरे कार्यक्रम के बाद जब मेरे आयोजक मित्र ने उनसे मेरी मुलाक़ात कराई तो क़रीब 20 मिनट तक वार्ता दौरान मैंने महसूस किया कि जैसे काफी लंबे समय से जान पहचान हो। बातों-बातों में उन्होंने कहा था, ‘पत्रकारिता ज़ुनून मांगती है, अध्ययन मांगती है और लोग एक ही दिन में हाइक पाना चाहते हैं। यही कारण है कि लोग पत्रकारिता को पेशा बना लेते हैं। जबकि, फ़िर कहूँगा, यह ज़ुनून है।’

वरिष्ठ पत्रकार स्व. रोहित सरदाना जी की यह बातें आज भी अक्षरशः दिमाग में घूमती हैं। वह केवल पत्रकार नहीं, वरन एक दूरगामी चिंतक, प्रबुद्ध विश्लेषक और एक अच्छे वक्ता भी थे। पत्रकारिता जगत को उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी।

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