बंगाल चुनाव : ‘हिंसा’ का ‘राजनीति’ से पुराना ‘रिश्ता’

नई दिल्ली। कहना गलत नही होगा कि पश्चिम बंगाल की चुनावी और सियासी फिजा का इतिहास खून  से रंगा हुआ  है। बंगाल में भले ही पार्टी बदली हो लेकिन खूनी खेल नहीं बदला। बात की जाये पश्चिम बंगाल के लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों की, तो वह एक राज्य है, जहाँ भाजपा को  चमत्कारिक सफलता हासिल हुई। टीएमसी के गढ़ कहे जाने वाले इस राज्य में बीजेपी को 18 सीटें मिली थी, जिसकी उम्मीद शायद भाजपा को भी नही थी। हालांकि, नतीजे घोषित होने के बाद राज्य के कई हिस्सों में हिंसा की खबर सामने आई।

 
टीएमसी नेता ने हिंसा के लिए उकसाया

आम जनता ने आरोप लगाया कि तृणमूल पार्टी से निकाले गए स्थानीय नेता अराबुल इस्लाम ने हमलों और हिंसा के लिए उकसाया। लोगों ने नेता के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की। राज्य में कई जगहों पर हिंसा की खबर आई,  इस घटना से कई लोग घायल हुए। 


बाहरियों ने दिया हिंसा को अंजाम

भाजपा और  तृणमूल दोनों ने ही इस हिंसा के लिए एक दूसरे को दोष दिया। दोनों का यही कहना था कि  इस हिंसा को अंजाम ‘बाहरियों’ के जरिए दिया गया था। मामला इतना बढ़ चुका था कि लोगों के घरों में तोड़फोड़ की गई थी, लोगों पर हमले किए गए और कही जगहों पर फायरिंग की भी एक घटना भी सामने  आई।  बंगाल एक ऐसे राज्य के रूप में जाना जाता है जहाँ चुनाव से पहले और मतदान के समय  लगातार हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती है।


हिंसा पर आरोप प्रत्यारोप

यूं तो बंगाल में हमेशा से ही हिंसात्मक राजनीति का दौर रहा है,  लेकिन इस घटना के बाद सियासत का एक विकराल रूप देखने को मिला , पश्चिम बंगाल की राजनीति में खासा उबाल देखने को मिला । जहां राजनीतिक हिंसा,  हत्याएं और आरोप प्रत्यारोप देखने को मिला।

बीजेपी-टीएमसी कट्टर प्रतिद्वंद्वी

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक सफर में टीएमसी और भाजपा एक दूसरे के  कट्टर प्रतिद्वंदी रूप में दिखाई देते है। ऐसे में दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाने का मौका नही गंवाते। कुछ लोगों का मानना था कि बंगाल में भाजपा के तेजी से बढ़ते प्रभाव के कारण और  अपनी सत्ता बचाए रखने का नतीजा यह घटना थी, इसलिए राजनीतिक हिंसा के रूप में सामने आई। पश्चिम बंगाल में चुनावी राजनीति हमेशा से ही हिंसक रही है और वहां शायद ही ऐसा हुआ हो जब कोई चुनाव बग़ैर किसी खूनखराबे के संपन्न हुआ हो।

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