अमर भारती : श्री बालाजी धाम डूंडाहेड़ा में चल रही श्रीराम कथा के चौथे दिन महामंडलेश्वर श्री भैया दास जी महाराज की धर्म बेटी बाल साध्वी राधा देवी जी ने नारद मोह का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान की भक्ति जीव को भवसागर से पार भी करती है, और अगर भगवान की भक्ति का अहंकार हो जाए तो अहंकार युक्त भक्ति जीव का पतन भी कर देती है। देव ऋषि नारद भगवान विष्णु के परम भक्त थे भगवान की भक्ति करने के लिए हिमालय की कंदरा में जाकर एक झरने के किनारे बैठ गई बड़ी सुंदर गुफा थी गुफा में बैठते ही देव ऋषि नारद की समाधि लग गई और भगवन के स्वरूप का आनंद प्राप्त करने लगे देव ऋषि नारद की समाधि को देखकर देवराज इंद्र भयभीत हो गए।

देवराज इंद्र को लगा कहीं देव ऋषि नारद की भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी कहीं मेरा इंद्रासन देव ऋषि नारद को ना दे। इसलिए इंद्र ने देव ऋषि नारद की समाधि को तोड़ने का प्रयत्न किया अनेक प्रकार से भी जब देव ऋषि नारद अपनी समाधि से नहीं हटे तो देव लोक की अप्सराएं आई उर्वशी आदि भी जब देव ऋषि का ध्यान भंग नहीं कर पाई तो इंद्र घबराया और देव ऋषि नारद के चरणों में जाकर नतमस्तक हो गया घबराकर क्षमा याचना करने लगा क्योंकि इंद्र को भी था। कहीं देव ऋषि नारद मुझे श्राप ना दे दे देव ऋषि नारद समाधि से उठे इंद्र को छमा किया और भगवान शंकर की ओर चल दिए। भगवान शंकर को सारी बात बताई भगवान शंकर ने देवरी से नारद को समझाया की यह सब बात भगवान विष्णु को मत बताना क्योंकि वह तो अंतर्यामी है। देव ऋषि नारद को बुरा लगा जैसे मरीज को परहेज अच्छा नहीं लगता ठीक उसी प्रकार देव ऋषि नारद को शंकर जी की बात अच्छी नहीं लगी और वहां से तुरंत ब्रह्मा जी के पास गए।

ब्रह्मा जी ने भी समझाया अब तो ब्रह्मा जी की भी बात अच्छी नहीं लगी भगवान विष्णु के पास गए भगवान विष्णु ने जैसी देव ऋषि नारद को देखा उनके मन की बात को समझ गए और भगवान विष्णु के बोलने से पहले ही देवी श्री नारद ने अपनी सब महिमा गान शुरू कर दी अब तो भगवान विष्णु ने समझा की देव ऋषि नारद को अहंकार हो गया है इनका अहंकार समाप्त करना चाहिए वरना नारद जी के लिए यह अहंकार कष्टदायक होगा भगवान ने माया रची एक सुंदर नगरी बनाई। उसमें एक विश्व मोहिनी नाम की कन्या के विवाह तैयारियों की देव ऋषि नारद जब उस नगर के सामने से निकले तुम्हा की शोभा देखकर मोहित हो गए। जब उस कन्या को देखा उसकी भाग्य रेखा देखा अब तो और भी मोहित हो गए माया में फंस गए नारद के मन में आया कि जो इस कन्या से शादी करेगा। वह तो पूरे ब्रह्मांड का नायक होगा देव ऋषि नारद भगवान विष्णु के पास गए उनसे अपना स्वरूप मांगा भगवान विष्णु ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया।

क्योंकि देव ऋषि नारद का कल्याण चाहते थे भगवान विष्णु कन्या स्वयंवर में उस कन्या ने किसी अन्य राजा की गले में माला डाल दी तो भगवान के पार्षद जय और विजय इस पर हंसने लगे देव ऋषि नारद ने जय और विजय को श्राप दे दिया और भगवान विष्णु को भी श्राप दे दिया कि तुमने जो आज मेरा बंदर का मुख् बनाया है। यही आगे चलकर तुम्हारी रक्षा करेगा भगवान विष्णु ने अपना असली रूप दिखाया तो देव ऋषि नारद का मुंह दूर हुआ देव ऋषि नारद को दुख भी हुआ कि मैंने भगवान को श्राप दे दिया परंतु भगवान ने देव ऋषि  नारद को समझाया कि यह सब मेरी इच्छा सेवा है अहंकार जीव का सबसे बड़ा दुश्मन है। किसी बात का भी अहंकार नहीं करना चाहिए कथा में दूर-दूर से भक्तों ने आकर कथा का आनंद प्राप्त किया।

रिपोर्ट-यशपाल कसाना