अमर भारती: जब बात हो भारत जैसे विशाल देश की भूखमरी के बारे में तो आप भी सोच में पड़ जायेंगें की भारत जैसे कृषि प्रधान और विकासशील देश में भूखमरी जैसा मुद्दा कहा से आ गया। इसी बात को जानने के लिए थोड़ा सा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक जाना होगा क्योकि यह मुद्दा किसी एक गांव,शहर,प्रदेश,देश या व्यक्ति विशेष का नही है। यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर का है। जो किसी व्यक्ति विशेष से मतलब नही रखता है। क्योकि भूख हर किसी को लगती है। मंगलवार को जो ग्लोबल हंगर इंडेक्स, 2019 की रैंकिंग जारी हुई है। वह बहुत ही चौकाने वाली है इस रैंकिंग के मुताबिक भारत में स्थिति काफ़ी गंभीर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स  में भारत 117 देशों में से 102 वें स्थान पर है, भारत की यह रैंकिंग लगातार नीचे खिसकना जारी है। 2014 में, भारत 77 देशों में से 55 वें स्थान पर था।

आपको बता दे कि यह रिपोर्ट उस वक्त आयी है जब महाराष्ट्र और हारियाणा में विधान सभा चुनाव होने को है। साथ ही आपको बताते चले कि अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकी शहर ह्यूस्टन में आयोजित “हाउडी मोदी” कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी भारतीय समुदाय के करीब 50,000 लोगो को संबोधित करते हुए कहा था कि भारत में सब कुछ ठीक है।पीएम ने अपनी बात पर जोर देते हुए उसे आठ अलग-अलग भारतीय भाषाओ में कहा।हालांकि,पीएम के इस डायलॉग पर विवाद खड़ हो गए थे।जहा यह कहा जा रहा था कि आर्थिक मोर्चे पर भारत लगातार झटके झेल रहा है। साथ कहा गया था कि पीएम मोदी ने तथ्यो की अनदेखी करते हुए कैसे विश्व बिरादरी के सामने कह दिया कि आँल इज वेल

अब सवाल यह उठता है कि सर्वाधिक तेज़ विकास दर के बावजूद विश्व के अन्य कई देशों की तरह ही भारत की अर्थव्यवस्था भी कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है। कृषिगत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति, रोज़गार सृजन की चुनौतियाँ और कई आर्थिक क्षेत्रों में कमज़ोर प्रदर्शन भारत की मुख्य समस्याएँ हैं। आर्थिक वृद्धि की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ते भारत के कदमों को कई बार ये तीनों ही चुनौतियाँ एक साथ या बारी-बारी से जकड़ लेती हैं। अर्थव्यवस्था, रोज़गार और कृषि क्षेत्र तीनों ही एक-दूसरे से कुछ इस प्रकार से जुड़े हुए हैं कि किसी एक में भी लाया गया बदलाव औरों को प्रभावित करता है। किसी भी तंत्र द्वारा बेहतर कार्य निष्पादन क्षमता के लिये यह आवश्यक है कि इसके सभी अंग एक-दूसरे से समन्वित ढंग से जुड़े हों। जिस प्रकार मानव शरीर में हृदय, रक्त और धमनियों के मध्य आपसी समन्यव से शरीर के प्रत्येक कोने में रक्त का संचार होता है, ठीक उसी प्रकार से अर्थव्यवस्था, समाज और कृषि को एक साथ मिलाकर ही हम वास्तविक संवृद्धि पा सकते हैं। समस्या यह भी है कि आर्थिक विकास के इन घटकों का हम अलग-अलग अध्ययन करते हैं, अर्थशास्त्री केवल अर्थव्यवस्था की चिंता करता है और समाजशास्त्री सामाजिक चिंताओं की बात करता है। विकास की गति  बनाए रखने के लिये प्रचलित तरीकों में बदलाव लाते हुए एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करने की आवश्यकता है जो इन्हें एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी बना सके। और मजेदार बात यह है कि भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका जैसे देश में आँल इज वेल की बात कर रहे है।

रिपोर्ट-शिवनन्दन सिहं