अमर भारती : झारखंड के नक्सल प्रभावित गांव लातेहार में डिजिटल लिटरेसी से बड़े बदलवा आए है। जहां पहले औरतें घर से बाहर कदम रखने से पहले दस बार सोचती थी आज वही अपने समुदाय और गांव की समस्याओं और मुद्दों को बेझिझक दुनिया के सामने रख रही हैं। डिजिटल लिटरेसी ने ग्रामीण क्षेत्र की आधी आबादी को सिर्फ जागरूक ही नहीं किया है बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त भी बनाया है। इस बदलवा पीछे के चेहरे कुछ पत्रकार दीदियां बनी है।
कभी खेत में हस्ली और कुदाल चलने वाले ग्रामीणों ने आज मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर को अपना हथियार बनाया लिया है। जिस वजह से नक्सल प्रभावित जिलों में विकास की नई लहर आयी है। यहां पर लोग अख़बार, मैगज़ीन से लेकर मोबाइल सोशल मीडिया पर देश दुनिया की खबरे देखते है। राजनीति से के लेकर खेल कूद के समाचार सुनते और पढ़ते है। रूढ़िवादी मान्यताओं और सामाजिक कुरीतियों से बाहर निकालने वाली खबरे भी शामिल है।
सखी मंडल से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं सामुदायिक पत्रकार का प्रशिक्षण ले चुकी है और अब वह अपने समुदाय और गांव की कहानी आम जनता तक पहुंचाती है जहां अकसर पत्रकार नहीं पहुंच पाते। एक ऐसी ही महिला है सविता देवी। मुख्य कार्यालय से 55 किलोमीटर दूर गारू प्रखंड की निवासी सविता ने जे एस एल पी एस के मदद से सामुदायिक पत्रकारिता में प्रशिक्षण ले चुकी है। वह अपने गांव के लिए खबरे लिखती है। बताती है कि उन्हें अब फोटो खीचना भी आ गया है। हर खबर के साथ अब फोटो भी लगाती है।
सविता देवी की तरह ही जिले की अन्य महिलाएं भी अपने पैरो की बेड़ियां तोड़ कर आगे आ रही है। यूट्यूब और सोशल नेटवर्किंग साइट्स को अपना शस्त्र बना कर महिलाओं की संघर्ष की कहानियां साझा कर रही हैं। जिन्हे कभी उनके लिए बनी सरकारी योजनाओं के बारे में पता भी नहीं चल पता था वो आज लोगों को उससे अवगत करा रही है साथ ही सरकारी योजनाओं का लाभ भी उठा रही है। सखी मंडल से जुड़ने के बाद महिलाएं इसे अपनी ताकत बताती है।

रिपोर्ट- प्रिति शर्मा

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