अमर भारती : सोनिया की जीत कांग्रेस के मूल वोटरों ने पक्की की इसका श्रेय भले ही कोई लेना चाहे लेकिन इतना मूल वोट तो कांग्रेस का है ही। इसमे किसी पार्टी या प्रत्याशी के प्रयास से वोट मिलनें की बात बेइमानी ही है। बल्कि अमेठी में राहुल की जनता से दुरी उन्हे ले डूबी। 5 साल पहले की बात है दिल्ली के पत्रकारों ने प्रियंका गांधी वाड्रा से पूछा कि, स्मृति ईरानी अमेठी में राहुल गांधी को कितना घेर पायेंगी ? प्रियंका उपहास उड़ाने वाले अंदाज में बोलीं-हू इज स्मृति ? पांच साल के भीतर ही उसी स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता का अमेठी से तम्बू कनात उखाड़ दिया। अमेठी से हारने वाले राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।

राहुल गांधी ने राजनैतिक जीवन की शुरुआत अमेठी से की थी। उनके पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी की चुनावी राजनीति की शुरुआत भी अमेठी से हुयी थी। 2014 में कड़ी टक्कर के बाद भी कांग्रेस बेपरवाह बनी रही। पांच साल तक बतौर सांसद राहुल गांधी तथा बतौर कैंपेनर प्रियंका गांधी ने अमेठी की नाराजगी दूर करने की कोई कोशिश नहीं की।दूसरी ओर चुनाव हारकर भी स्मृति ईरानी की अमेठी में सक्रियता राहुल से अधिक रही। पांच सालों में स्मृति ने पहुंच और सम्पर्क से अमेठी को कस लिया। नतीजतन कांग्रेस के हालात और बदतर होते चले गये। खतरा भांपकर राहुल गांधी ने अमेठी के साथ वायनाड से पर्चा दाखिल कर दिया।राहुल के इस फैसले ने अमेठी के राजनैतिक मिजाज को सरेआम कर दिया। इसे सुविधाभोगी राजनीति कहा जा सकता है। जहां से आसानी से जीत मिले वहीं पहुंच जाओ,जिन लोगों ने लम्बे समय तक साथ दिया,उनकी शिकायतों को अनदेखा करके। विधानसभा से लेकर निकाय तक के चुनावों में कांग्रेस पिटती रही।पांच सालों में सोनिया गांधी गिने चुने मौकों पर ही दिखीं।

उनके स्वास्थ्य कारणों को समझा जा सकता है। लेकिन प्रियंका गांधी केवल चुनाव प्रचार के लिए आनेवाली प्रियंका गांधी रायबरेली में चुनाव बाद ढ़ूंढ़ने पर भी नहीं मिलतीं। प्रियंका गांधी के निर्धारित लक्ष्य ‘ पांचवीं बार पांच लाख पार’की हवा निकल गयी। कांग्रेस महासचिव बनने के बाद यह उनका पहला चुनाव था।प्रियंका की अगुवाई में कांग्रेस बाहर तो छोड़िए,परम्परागत माँ के क्षेत्र में हाफती नजर आई। और भाई के क्षेत्र को न बचा सकी। सोनिया गांधी की जीत का अब तक का सबसे कम अंतर,विपक्ष से मिली अब तक की सबसे मजबूत चुनौती का संदेश साफ है। रायबरेली में कांग्रेस की नींव हिल चुकी है।दीवारें दरक गयी हैं।अगर अब भी जनता से ढंग से रुबरु न हुयी और केवल प्रतिनिधियो के सहारे राजनीति करती नजर आई तो यह सीट भी हाथ से जाने में देर नही लगेगी ।अब जनता वोट के ठेकेदारों से नही अपने प्रतिनिधि से रुबरु हो कर दर्द बताना चाहती है। जो जनता की सुनेगा वही  राज करेगा क्योकि अब जनता राज है। ये बात जनता भी जान चुकी है।

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