अमर भारती : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की पुलिस की बात करें तो यह पुरे देश में अव्वल मानी जाती है। दिल्ली में जगह-जगह पर लगे विज्ञापनों से भी आपको अंदाजा हो जाएगा कि यहां की पुलिस कितनी दमदार है। अब अगर हम इसमें महिला पुलिस कर्मियों की बात करें तो उनके विज्ञापन भी कुछ ऐसा ही बयां करते हैं। कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट इनिशिएटिव की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली की महिला पीसीआर वैन में तैनात पुलिसकर्मियों का विश्वास डगमगा रहा है। उन्हें खुद पर पहले की तरह भरोसा नहीं रहा है। नतीजा, कभी वे मौके पर देर से पहुंचती हैं तो कभी उन्हें ज्यादा ट्रैफिक के बीच चलने में अपने आप को असहजता महसूस होती है।

कुछ महिला कर्मियों की बातचीत में यह भी निकल कर सामने आया है कि वे हाई क्राइम जोन में काम नहीं कर सकती। रात में ड्यूटी देना भी ये महिला पुलिसकर्मी अपने लिए ठीक नहीं समझती। जिन जगहों पर सर्वे कर यह रिपोर्ट तैयार की गई, वहां की 60 फीसदी जनता कहती है कि हमने तो कभी अपने इलाके में अभी तक कोई महिला पीसीआर ही देखी नहीं है।

बता दें कि दिल्ली पुलिस ने 9 सितंबर 2016 को पांच महिला पीसीआर वैन का एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था जिसमें केवल महिलाओं को ही शामिल किया गया था। सीएचआरआई ने दिल्ली पुलिस के सहयोग से इनका कामकाज जांचने के मकसद से एक रिपोर्ट भी तैयार की थी। इसमें इंडिया गेट के सी-हेक्सागन (वैन-26), जेएमएम कालेज (वैन-41), विजय चौक/साउथ ब्लॉक (वैन-68), कस्तूरबा गांधी मार्ग पर अमेरिकन सेंटर (वैन-75) और खान मार्केट (वैन-81) को सर्वे में शामिल किया गया। पीसीआर वैन के इंचार्ज और अन्य स्टाफ ने सीएचआरआई के सामने खुलकर अपनी बात रखी। पांचों महिला पीसीआर वैन में कुल पीसीआर कॉल के मुकाबले केवल एक फीसदी से भी कम कॉल रिसीव की गई।

यानी अक्तूबर 2016 से लेकर जून 2017 तक 0.55 प्रतिशत कॉल रिसीव हुई थी। नई दिल्ली जोन में अगर सभी पीसीआर की बात करें तो उक्त अवधि में हर महीने औसतन 65-66 कॉल आ रही थी। पेट्रोलिंग में भी ये वैन पीछे रही। जब कोई कॉल आती है तो उसके बाद जो रिपोर्ट तैयार करनी होती है, इसमें सात केसों में से केवल एक ही केस की सही रिपोर्ट की गई।

शिकायतकर्ता का क्या फीडबैक रहा, इस पर भी महिला पीसीआर का काम संतोषजनक नहीं था। इतना ही नहीं, कॉल करने वाले व्यक्ति का डॉटा भी आधा अधूरा ही तैयार किया गया। कॉल आने के बाद मौके पर पहुंचने के लिए जो समय तय किया गया है, ज्यादातर पीसीआर उस समय सीमा से काफी आगे निकल गई। किसी भी महिला पुलिसकर्मी को यह नहीं मालूम था कि उनकी तैनाती सरकार ने किस तरीके से की है। पांच में से दो पीसीआर वैन में तैनात महिलाकर्मियों से जब यह पूछा गया कि उन्हें पीसीआर डयूटी के लिए कितने दिन की ट्रेनिंग दी गई है। जवाब मिला कि एक महीने का प्रशिक्षण मिला है, जबकि सही जवाब दो सप्ताह था।

दरअसल राजस्थान और हरियाणा इन दोनों राज्यों की महिला पुलिसकर्मियों का कहना था कि वे अपने परिवार से दूर नहीं रह सकती हैं। सीएचआरआई का कहना है कि चूंकि ये महिलाएं जब पुलिस में भर्ती होती हैं तो इनकी शादी भी जल्द हो जाती है। इसके बाद ये जिस आयु में होती हैं, वह घर-परिवार को आगे बढ़ाने का समय होता है। महिलाकर्मियों का कहना था कि वे रात में डयूटी नहीं दे सकती।यदि कहीं पर झगड़ा हो जाए और उसमें आदमी शामिल हों तो हमें मिक्स वैन भेजनी पड़ती है। नई लड़कियों को तो ज्यादा जानकारी भी नहीं होती।

गौरतलब है कि सीएचआरआई की टीम की सदस्य देविका प्रसाद, अदिति दत्ता और देवयानी श्रीवास्तव का कहना है कि दिल्ली में महिला पीसीआर वैन को बंद किया जाए। इसकी जगह पर अगर पूरी दिल्ली में तैनात सभी पीसीआर में एक-एक महिलाकर्मी तैनात कर दी जाए तो यह ज्यादा कारगर साबित होगा। इसमे एक बात यह भी है फीडबैक सिस्टम को अगर थोड़ा सुधारा जाए तो पब्लिक के साथ ज्यादा से ज्यादा तालमेल किया जा सके। ट्रेनिंग का पैटर्न बदला जाए और इसे एक औपचारिकता के दायरे से बाहर निकालकर प्राथमिकता के तौर पर लें। अगर कोई गलत कॉल करता है तो उसके खिलाफ स्वत: संज्ञान लेने की पावर पीसीआर कर्मियों को दी जाए। दिल्ली जैसे शहर में महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए महिला पीसीआर वैन की रूपरेखा दोबारा से तैयार करें। इसमें शिकायत रिसीव करने और एक्शन लेने जैसी बातों को ध्यान में रखा जाए।

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