अमर भारती:  दिल्ली  में अजय माकन के इस्तीफे के बाद गुरुवार को कांग्रेस के नए अध्यक्ष का एलान कर दिया गया। कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर दिल्ली प्रदेश की कमान शीला दीक्षित के हाथों में सौंप दी है। दिल्ली में जिस तरह से आबादी बढ़ी है, और लोगों की सोच बदलती रहती है उसी तरह राजनीतिक पार्टियां अपना समीकरण भी बदलती रहतीं हैं।

एक समय था जब दिल्ली में पंजाबी ज्यादा थे अब पूर्वांचल और बिहार के लोग तेजी से दिल्ली में बस रहे हैं। इस लिहाज से शीला के प्रदेश अध्यक्ष बनने से कांग्रेस को लाभ मिल सकता है शीला का पंजाब, यूपी और दिल्ली से गहरा नाता है। उन्होंने दिल्ली में पढ़ाई की है, खानदानी तौर पर उनका पंजाब से नाता रहा है वहीं उन्नाव यूपी के मशहूर कांग्रेस नेता पंडित उमाशंकर दीक्षित के घर से भी उनका ताल्लुक है कन्नौज से शीला सांसद भी रह चुकी हैं वहीं 1998 तक दिल्ली में बीजेपी का दबदबा था जिसे भेदने के लिए कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष की कमान शीला दीक्षित के हाथों में दी थी और पार्टी आलाकमान का ये दांव काम आया था।

कांग्रेस का वनवास खत्म हुआ और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री बनीं शीला में एक साथ कई खूबियां हैं वे पंजाबी हैं और पूर्वांचली भी हैं इसके साथ महिला और ब्राह्मण तो हैं ही दिल्ली में कांग्रेस के बाकी नेताओं में उनकी स्वीकार्यकता ज्यादा देखी जा सकती है। यही वजह है कि 80 साल के उम्र के पड़ाव पर होने के बावजूद शीला दीक्षित कांग्रेस के लिए दिल्ली में जरूरी बन गई है। इस पर अजय माकन ने उन्हें ट्वीट कर बधाई भी दी है।

हालांकि उनके स्वास्थ्य को देखते हुए कांग्रेस ने देवेंद्र यादव, राजेश लिलोथिया और हारून यूसुफ को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। शीला दीक्षित  दिल्ली में 15 साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहीं हैं इसलिए उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से कांग्रेस पार्टी को 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में फायदा मिल सकता है सीएनजी यानी क्लीन एनर्जी की शुरुआत की गई थी मेट्रो का आगमन कांग्रेस के ही कार्यकाल में हुआ था। दिल्ली में सड़कों और फ्लाइओवरों के जाल में उनका ही योगदान माना जाता है उन्होंने कई सांस्कृतिक आयोजन शुरू कराए थे।

दिल्ली में हरियाली भी शीला के दौर में कराई गई है 24 घंटे बिजली दिल्ली को पहली बार नसीब उनके राज में ही हुई थी। कॉमनवेल्थ गेम जैसा बड़ा इवेंट सफलतापूर्वक कराने के पीछे भी शीला दीक्षित की मेहनत थी। अन्ना हजारे और केजरीवाल ने भ्रष्टाचार पर यूपीए सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। 2013 में अरविंद केजरीवाल दिल्ली वालों का दिल जीतने में कामयाब रहे खड़ी हुई सत्ता विरोधी लहर में शीला सरकार भी फंस गई और सत्ता उनके हाथ से फिसल गई। लेकिन अभी भी हार नहीं मान रहीं हैं। क्या वो कांग्रेस को फिर से सत्ता में ला सकतीं हैं कांग्रेस पार्टी के लिए कितना संघर्ष कर सकतीं हैं। अब शीला के लिए एक बार फिर चुनौती भरा समय है।

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