अमर भारती : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना था कि वो उत्तर प्रदेश की पुलिस को ऐसा बना देंगे कि खुद न्यूयॉर्क का पुलिस डिपार्टमेंट आकर पूछेगा कि भाई करते कैसे हो। तो अब यूपी पुलिस के इस सीक्रेट फार्मूले पर से पर्दा हटने वाला है। क्योंकि हम अब आपको दिखाने जा रहे हैं कि आखिर यूपी पुलिस काम कैसे करती है।

बंदूक चलानी नहीं आती। पिस्टल लोड कैसे करते हैं पता नहीं। हथियारों के नाम तो खैर कौन याद रखे। ऊपर से गोली और आंसू गैस के गोले की एक्सपाय़री डेट कब निकल गई याद ही नहीं। अब ऐसे में आप यूपी पुलिस से क्या उम्मीद करेगें? बस इतना ही कह सकते हैं कि सचमुच कमाल है योगी जी की पुलिस।

अब कोई बुरा ना मान जाए तो लगे हाथ ये भी बता दें कि यूपी पुलिस की इतनी सारी काबलिय़त की पोल-पट्टी कोई और नहीं बल्कि खुद यूपी पुलिस ही खोल रही है। दरअसल, यूपी पुलिस के एक साहब को लगा कि चलो ज़रा अपनी टीम का टेस्ट ले लें। अब उस टेस्ट में क्या-क्या होता है ये देखने लायक है।

सबसे पहले पश्चिमी यूपी के बिजनौर ज़िले के नजीबाबाद थाने की ट्रेनिंग की झलक देखिए। जहां बिजनौर के सीओ अरुण कुमार के आने से काफी पहले ये कह दिया था कि वो निरीक्षण करने आ रहे हैं। निरीक्षण की शुरुआत यूपी के इन दरोगा जी से हुई। दरोगा जी को पैलेट गन दिया गया और कहा चलाइए। अरे ये क्या ये मिस हो गई। सीओ साहब चिल्ला उठे।

एक अर्से से सरकार ने ये पैलेट गन थाने को दी हुई है। थाने के दिवान साहब ने संभाल कर भी रखी। पर ना दीवान साहब से मतलब। ना इंस्पेक्टर साहब से मतलब। चल रही है नौकरी। चलने दीजिए। थानेदार ने चलाई, लेकिन ये क्या साहब फिर कह रहे हैं कि ओह माई गॉड.. फिर मिस हो गई। मगर अब अगला फायर कैसे करें। गोली कहां लगेगी। कोई तो बता दो।

साहब थानेदार से बोले, अब बंदूक नीचे करो। गोली चेंज करो। वहां खड़े होकर ये सब देख रहे दीवान साहब की तो जैसे इज्जत पर बन आई। उन्होंने थानेदार से बंदूक छीनी और खुद निशाना लगाने लगे। मगर ये क्या दीवान ने गोली तो चलाई लेकिन फुस्स हो गई।

अब तो निरीक्षण अधिकारी ने आखिरकार कह ही दिया, रहने दो तुमसे ना हो पाएगा। चलिए अब दूसरी बंदूक ट्राइ करते हैं। कोई बोलेगा नहीं। एक तो सीओ साहब सिर पर खड़े हैं। ऊपर से दूसरे साथियों के सामने बेइज्जती भी हो रही है। चलिए कम से कम इंस्पेक्टर साहब को ये तो पता होगा ही कि ये बंदूक चलती कैसे है। साहब ने पूछा- बताइये इसे चलाते कैसे हैं। और इस बंदूक को कहते क्या हैं।

आज तो सरदार जी मुश्किल में फंस गए हैं। क्योंकि सीओ साहब के किसी भी सवाल का जवाब इंस्पेक्टर साहब के पास नहीं है। साहब ने झल्लाकर पूछा, पहला काम क्या करते हैं। दीवान साहब बार-बार इंस्पेक्टर साहब की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं। मगर सीओ साहब ने उन्हें चुप करा दिया।

करीब 15 से 20 मिनट के टेस्ट के बाद ये तय हुआ कि इंस्पेक्टर साहब को तो ना बंदूक चलाना आता है औऱ ना ही उसके बारे में उन्हें कुछ पता है। साहब ने अपने स्टाफ से कहा “लिखों इन सबके बारे में… शून्य जानकारी है।” खैर अब इंस्पेक्टर साहब की जानकारी ज़ीरो है। लिहाज़ा एसओ साहब ने निरीक्षण करने के बजाए हथियारों की जानकारी देनी शुरू कर दी।

मगर ये क्या सीओ साहब के समझाने और बताने के बाद भी इंस्पेक्टर साहब गन नहीं चला पाए। कुल मिलाकर एक कंबल पर बिछे असलहे और बारूद ने यूपी पुलिस के इन जवानों के ज़मीर की धज्जियां उड़ा दी। सीओ साहब को मजबूरी में कहना पड़ा- अगर आप प्रैक्टिस नहीं करेंगे तो बर्खास्त हो जाएंगे।

ऐसा नहीं है कि सीओ साहब थाने में किसी खास इंस्पेक्टर का इंस्पेक्शन करने आए हो। बल्कि उनका ये औचिक निरीक्षण तो पुलिस थाने और पुलिसवालों की तैयारी के लिए था। लिहाज़ा अब बारी थी दूसरे थाने की पुलिस वालों के सामान्य और प्रैक्टिल ज्ञान का।

उन्होंने थाने के उसी इंस्पेक्टर से पूछा इस असलहे का नाम क्या है। लीजिए साहब इंस्पेक्टर साहब तो बंदूक का नाम तक नहीं जानते। तो ये उसे चलाएंगे कैसे। हाथों में टियर गैस चलाने वाली बंदूक लेकर भी इंस्पेक्टर साहब ये नहीं बता पाए कि उसे कहते क्या हैं।

सीओ साहब फिर झल्ला गए और बोले- छोड़ दो नहीं हो पाएगा तुमसे। अब बारी थी थाने के दूसरे इंस्पेक्टर की। जिनके हाथ में आंसू गैस के गोले दिए गए। पूछा गया कि साहब इसे चलाते कैसे हैं। तो देखिए इंस्पेक्टर साहब ने क्या बताया। उन्होंने कहा कि आंसु गैस चलाएंगे और साहब लेट जाएंगे।

सीओ साहब ने सवाल दागा- आंसू गैस का गोला चलाने के बाद आप लेट जाएंगे? फिर सीओ साहब ने सबकी क्लास लगाई। हथियारों के सामान्य ज्ञान में यूपी पुलिस के जवानों का स्तर क्या है। थाने के दो दरोगाओं को छोड़कर दूसरे दरोगा तो पिस्टल और दूसरी राइफलों को खोल कर दोबारा बंद भी नही कर पाए। और ना ही उन्हें हथियारों के नाम तक पता थे।

जवानों के निरीक्षण के बाद साहब आगे बढ़े। हथियारों का निरीक्षण किया गया तो क्या सामने आया? पता चला कि कई बंदूक और हथगोले तो चार-चार साल पुराने हैं। कारतूस खराब हो चुके हैं। आंसू गैस के गोले भी धोखा दे गए। अब तो सीओ अरुण कुमार बुरी तरह झल्ला उठे और बोले- ये सारे एक्सपायर हो चुके हैं।

अब सोचिए भला थाने में अगर किसी इमरजेंसी से निपटने के लिए जवान ही तैयार ना हों और उनके हथियार भी एक्सपाइरी डेट के हों तो बुलंदशहर और गाज़ीपुर जैसी घटनाएं अगर हुईं तो उसमें हैरानी कैसी।

शायद इसी आधी अधूरी तैयारी का ही नतीजा था बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की मौत। और गाज़ीपुर में सिपाही सुरेश वत्स की मौत हो गई। कुल मिला कर यूपी पुलिस के थानों और जवानों में बस इतनी सी दिक्कत है। बाकी सब ठीक है।

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