अमर भारती : केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की मंजूरी के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा में देना बैंक और विजया बैंक के विलय का रास्ता साफ हो चुका है। अगस्त 2017 में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के 21 बैंकों को एकीकरण की अपनी-अपनी योजना पेश करने को कहा था। इस विलय से सरकारी बैंकों की संख्या 21 से घटकर 19 रह जाएगी।

हालांकि, देना बैंक की कमजोर वित्तीय स्थिति को लेकर इस प्रस्तावित विलय पर सवाल भी उठ रहे हैं। खुद पर फंसे कर्ज (एनपीए) के बड़े बोझ के कारण देना बैंक अभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन (पीसीए) के दायरे में है। इसी वजह से इस बैंक पर फिलहाल कर्ज देने को लेकर पाबंदी लगी हुई है।

सरकार का मानना है कि विलय के बाद इन बैंकों की संचालन क्षमता सुधरेगी, लागत में कटौती आएगी और नया बैंक मौजूदा कई प्रतिस्पर्धी बैंकों को मात दे सकेगा। यह विलय  सुधारात्मक कदम से मजबूरी ज्यादा लगता है क्योंकि इसके पीछे देना बैंक को प्रभावी तौर पर बेल आउट देना है जिसके कर्मचारियों और फंसे कर्जों के बोझ का असर नए बैंक पर भी पड़ेगा।

सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट  होना चाहिए कि आखिर इससे वह कौन सा लक्ष्य प्राप्त करना चाहती है। बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार किस बैंक का किसके साथ विलय होगा, इसका निर्णय करते वक्त बहुत सावधान रहने की जरूरत होती है। सुदृढ़ आर्थिक स्थित वाले बैंकों का पारस्परिक विलय करना ही सर्वोत्तम होता है क्योंकि उनके पास संसाधन, वित्तीय स्थिति और संस्कृति तीनों संतोषजनक होते हैं।

उनके सामने विलय प्रक्रिया की आवश्यकताओं को पूरा करने के सिवाय कोई और बाधा नहीं होती। अगर किसी बीमार बैंक का विलय किसी बड़े स्वस्थ बैंक के साथ किया जाएगा तो इससे विलय के वक्त बड़े स्वस्थ बैंक के लिए समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। देना बैंक की मौजूदा स्थिति विलय के बाद बने नए बैंक की क्षमता को भी प्रभावित करेगी। इससे इन मान्यताओं को बल मिलता है।

इन बैंकों की कई शाखाएं एक ही जगह पर काम कर रही हैं। अगर इनमें कुछ शाखाएं बंद होंगी तो कर्मचारियों के समायोजन का सवाल पैदा होगा। इसके अलावा, तीनों बैंकों की अलग-अलग कार्य प्रणाली है। एनपीए को बोझ तले दबे देना बैंक में शासन-प्रशासन की गंभीर समस्याएं होंगी। इस विलय से देना बैंक का फंसा कर्ज नए बैंक के खाते में आ जाएगा। देना बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 22 प्रतिशत के सर्वोच्च स्तर में है।

विजया बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 6.9 प्रतिशत है जबकि बैंक बड़ौदा का 12.4 प्रतिशत। इनके विलय से बने नए बैंक का ग्रॉस एनपीए रेशियो 13 प्रतिशत हो जाएगा जो बैंक ऑफ बड़ौदा के मोजूदा 12.4 प्रतिशत के रेशियो से खराब होगा। बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक और विजया बैंक का कुल फंसा हुआ कर्ज 80,000 करोड़ रुपये है। इनके विलय से इन फंसे कर्जों की वसूली में किस प्रकार मदद मिलेगी ?

इसलिए, इस विलय को दो बैंकों के जरिए देना बैंक के बेल आउट के रूप में देखा जाना अनुचित नहीं कहा जा सकता। केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आश्वासन दिया था कि न किसी की नौकरी जाएगी और न ही किसी की सेवा-शर्तों से छेड़छाड़ होगी। हालांकि विलय से असहमत बैंक कर्मचारियों के संगठनों का कहना है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि बैंकों के विलय से बनने वाला नया बैंक ज्यादा कुशल और क्षमतावान होता है।

उनका मानना है कि विलय से बैंक शाखाएं बंद हुई हैं, बैड लोन बढ़े हैं, स्टाफ की संख्या में कटौती हुई है और कारोबार भी घटा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया इसका उदाहरण है जो विलय के बाद 200 साल में पहली बार नुकसान में आ गया है।

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