प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना कि राम मंदिर के निर्माण के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले कोई अध्यादेश नहीं लाया जाएगा, निश्चित ही स्वागत योग्य है। उनकी इस घोषणा का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने अथवा अध्यादेश लाने की मांग पार्टी और मातृ संगठन के शीर्षस्थ स्तर से की गई।

इसके बावजूद, ऐसा फैसला कर प्रधानमंत्री ने दलीय हितों पर देश की न्याय व्यवस्था को वरीयता और सम्मान दिया है। एक संवाद समिति को दिए साक्षात्कार के दौरान अपने कठोर निर्णय की जानकारी देने के साथ ही उन्होंने न्याय प्रक्रिया की गति के धीमे चलने के लिए कपिल सिब्बल का नाम लिए बिना उन्हें इसका जिम्मेदार बताया।

उनका यह कहना भी सही है, क्योंकि उच्चतम न्यायलय में कपिल सिब्बल ने इस मामले की सुनवाई लोकसभा के चुनाव तक टालने का अनुरोध किया था। उनका कहना था कि इस मुद्दे का भारतीय जनता पार्टी चुनाव में राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है। उच्चतम न्यायालय ने इसी के बाद आगामी 4 जनवरी को सुनवाई की तिथि निर्धारित की।

कांग्रेस भाजपा के बारे में जो धारणा बनाने की कोशिश कर रही थी, वह प्रधानमंत्री मोदी की उक्त घोषणा के बाद ध्वस्त होती दिखाई दे रही है। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी को चुनावी राजनीति में राम मंदिर आंदोलन का भारी लाभ और श्रेय मिला है। लेकिन इसके बावजूद भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में यही कहा है कि इस मुद्दे का समाधान संविधान के दायरे में ही किया जाएगा।

घोषणा पत्र में दिए वचन को प्रधानमंत्री निभाते दिखाई दे रहे हैं। यह करना आसान नहीं है। यह मोदी जैसा साहसी और सिद्धांतप्रिय राजनेता ही कर सकता है। यदि मोदी सरकार सिर्फ चुनावी स्वार्थों पर अपनी दृष्टि केन्द्रित रखती तो उसे अध्यादेश लाने से कोई बात नहीं रोक सकती थी। उच्चतम न्यायालय से हाल ही में सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर ने कहा था कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मामला शीर्षस्थ नायायालय में विचाराधीन है। सरकार चाहे तो अध्यादेश ला सकती है अथवा तदर्थ कानून बना सकती है।

कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पूर्व अध्यादेश न लाने की घोषणा से इस मामले की शीघ्र सुनवाई करने की याचिकाओं को नैतिक बल मिला है। व्यापक राष्ट्र हित में खासतौर से देश की शांति और सौहार्द के लिए उच्चतम न्यायालय को त्वरित सुनवाई की याचनाओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

यह ठीक है कि न्यायालय की दृष्टि में यह भूमि विवाद है, लेकिन इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि यह एक राष्ट्रीय महत्व का विषय बन चुका है, जिससे देश की बड़ी जनसंख्या भावनात्मक रूप से जुड़ी है। कांग्रेस को भी इस मामले के शीघ्र समाधान में अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान करना चाहिए और इन आरोपों से बचना चाहिए कि वह मामले को कानूनी प्रक्रिया को धीमा करना चाहती है। न्यायालय का निर्णय आने के बाद मोदी सरकार भी अपने दायित्व से पीछे नहीं हटेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

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