देश में बाबरी कांड के बाद उपजी हिंदूवादी सहानुभूति की लहर में देश के तमाम नेता हीरो बन गए। जिसमें मुख्य रूप से अटल बिहारी वाजपेयी , लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर, विनय कटियार, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान समेत दिग्गज भाजपाई नेताओं में एक भी ऐसा नाम नहीं जिन्होंने मंदिर मुद्दे को हवा देकर सुलगाया ना हो। हालांकि आज यह सभी नेता लगभग सियासी शून्य पर पहुंच चुके हैं।

सियासी शून्यता की वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन भारतीय जनता पार्टी में मोदी ही एक इकलौते ऐसे नेता बनकर उभरे जिन्होंने खुद के दम पर भाजपा की अंदरूनी राजनीति में और देश की राजनीति में नया मुकाम हासिल किया इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता। वह खुद भी बड़े बने और पार्टी को भी नई ऊंचाई पर पहुंचाया। भाजपा के पूर्वजों ने भी नहीं सोचा होगा कि बीजेपी देश में इस तरह राज करेगी, परंतु अपनी रणनीतिक सूझबूझ से पूरी पार्टी और विरोधियों को भी अपनी राजनीतिक कुशलता का लोहा मनवाने में नरेंद्र मोदी सफल रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी नरेंद्र मोदी भाजपा में सर्व स्वीकार्य नेता बने यह उनकी राजनीतिक कुशलता दर्शाता है।

उस पूरे चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेस की विफलताओं, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को ही उठाया। मंदिर मुद्दे पर उन्होंने तब भी भाजपा के अन्य हिंदूवादी नेताओं की तरह कोई बात नहीं कही। जिसका असर बीजेपी को सत्ता के रूप में दिखाई दिया। दूसरी तरफ आरएसएस के सहयोग से आम जनता को भी विश्वास दिलाने में सफल हुए कि तत्कालीन सरकार उनके हित की अनदेखी कर रही है। नरेंद्र मोदी ने देश की जनता को आस्था से तो जोड़े रखा, लेकिन मंदिर के नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं को भी राष्ट्रहित में किनारे लगाने का काम किया। विभिन्न अवसरों पर और रैलियों में भी नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर के मुद्दे को आस्था का मुद्दा बता कर कांग्रेस की गलत नीतियों को ही ज्यादा उठाने का प्रयास किया।

इस दौरान उन्होंने अपनी एंटी मुस्लिम छवि को भी बड़ी साफगोई से मिटाने की कोशिश की जिसमें वह एक हद तक सफल होते भी नजर आए। हाल ही में राम मंदिर मुद्दे को लेकर अध्यादेश लाए जाने के लिए साधु-संतों एवं बीजेपी की सहयोगी पार्टियों के दबाव बनाने पर भी वह इस मुद्दे से बचते नजर आए। देश में लोकसभा चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी से कई हिंदूवादी नेताओं की उम्मीदें बंध गई थी कि मोदी राम मंदिर मुद्दे पर कोई बड़ा फैसला लेंगे पर उन्होंने मंदिर मुद्दे को कोर्ट के मार्फत ही सुलझने का इंतजार किया और अपने बयानों से भी यह बताने का प्रयास किया कि वह ऐसा कोई बड़ा कदम नहीं उठाएंगे।

यह बात अलग है कि आज भी देश की जनता का एक विशेष वर्ग उनके ऐसे किसी कदम का इंतजार कर रहा है। पांच राज्यों के चुनाव की तरह ही 2019 के चुनावों में भी मोदी राम मंदिर मुद्दे के सहारे नहीं है। वह खुलकर कांग्रेस पार्टी और उनके नेताओं को टारगेट कर रहे हैं, जिससे उनके कार्यकाल की तुलना कांग्रेस के कामकाज से हो। वह पूरी तरह आश्वस्त हैं कि देश की जनता उनकी बात सुन रही है जिसका नतीजा उन्हें 2019 के आम चुनावों में दिखाई दे सकता है। राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठेगा यह कह पाना अभी थोड़ा मुश्किल है पर जैसे-जैसे चुनावी बयार बहेगी सभी दलों की राजनीति का एजेंडा जनता के सामने आ जाएगा।

 

विजय कुमार त्रिपाठी

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