बसपा सुप्रीमो मायावती की कांग्रेस को मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार से समर्थन वापसी की चेतावनी के एक दिन बाद ही मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने उनकी मांग मान ली। हालांकि, राजस्थान सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है, लेकिन इस बात की प्रबल संभावना है कि राजस्थान सरकार भी ऐसा ही कदम उठाएगी।

बसपा सुप्रीमो ने कहा था कि तीन राज्यों में बनी कांग्रेस की सरकार को अनुसूचित जाति – जनजाति अत्याचार निरोधक कानून 1989 और सरकारी कर्मियों की प्रोन्नति में आरक्षण बहाली को लेकर गत 2 अप्रैल 2018 को हुए भारत बंद के दौरान फंसाए गए निर्दोषों के मामले वापस लेने चाहिए। खासकर दलित और आदिवासी समाज के हित से जुड़े ऐसे अहम मुद्दे पर कांग्रेस की सरकारों द्वारा उचित कार्रवाई न करने पर मध्यप्रदेश व राजस्थान में समर्थन पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।

मंगलवार को मध्य प्रदेश के गृह मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि मध्य प्रदेश में राजनीतिक द्वेष से दर्ज किए गए मामलों को तुरंत वापस लिया जाएगा। बीते महीने 11 दिसंबर को विधानसभा चुनावों के नतीजों में कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश और राजस्थान में बहुमत से कुछ सीटें दूर रह गई थी। 230 सदस्यीय मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस 114 सीटों पर जीती, वहीं 200 सदस्यीय राजस्थान में 99 सीट पर जीत हासिल कर पाई थी।

इस दौरान कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए निर्दलीयों और क्षेत्रीय दलों पर आश्रित होना पड़ा था। नतीजों के बाद बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस को बाहर से समर्थन देने की घोषणा की थी। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में पार्टी  के 2 और राजस्थान में 6 विधायक जीते थे।

उच्चतम न्यायालय ने गत 20 मार्च को दिए अपने फैसले में अनुसूचित जाति – जनजाति अत्याचार निरोधक कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए दिशा- निर्देश जारी किए थे। शीर्षस्थ न्यायलय ने कहा था कि इस कानून में शिकायत मिलने के बाद तुरंत मामला दर्ज नहीं होगा। पुलिस उपाधीक्षक स्तर का अधिकारी पहले शिकायत की प्रारंभिक जांच करके पता लगाएगा कि मामला झूठा या दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं है। इसके अलावा इस कानून में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद अभियुक्त को तुरंत गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

उच्चतम न्यायलय के इस फैसले के खिलाफ दो अप्रैल को दलित संगठन सड़कों पर उतरे थे। दलित समुदाय ने दो अप्रैल को ‘भारत बंद’ किया था। केंद्र सरकार को विरोध की आंच में झुलसना पड़ा। देशभर में हुए दलित आंदोलन में कई इलाकों में हिंसा हुई थी, जिसमें एक दर्जन लोगों की मौत हो गई थी। बाद में राष्ट्रपति ने इस फैसले को निष्प्रभावी करने वाले मोदी सरकार के संशोधन को मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून पूर्व की तरह सख्त प्रावधानों से लैस हो गया।

यह घटनाचक्र साफ-साफ दिखाता है कि कानून के बावजूद अभी भी हम समरस समाज का लक्ष्य हासिल करने से कोसों दूर हैं। हालांकि इन कानूनों का उद्देश्य अत्याचार पर रोकथाम के साथ ही ऊंच-नीच की भावना समाप्त करना और समता एवं ममता पर आधारित समाज का निर्माण करना है। लेकिन कानून से समरसता की जगह वैमनस्य बढ़ता दिखाई दे रहा है। इस समस्या की गहराई से पड़ताल करना जरूरी है, क्योंकि यह देश की सामाजिक संरचना की मजबूती की दृष्टि से बहुत जरूरी है।

आरक्षण के नाम पर वोट की राजनीति की जाती है और इसे समाजोत्थान के बजाय राजनीतिक अस्त्र बना दिया गया है। राज्य सरकारों के फैसले के बाद मुकदमे तो वापस हो जाएंगे, लेकिन सवर्णों और अनुसूचित जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों में समरसता की चिंता भी राजनेताओं को करनी चाहिए, जो सिर्फ कानून से सम्भव नहीं है। 

अनिल गुप्ता

आप अपनी प्रतिक्रिया इस ईमेल आई. डी. पर भी भेज सकते हैं।

anilg@amarbharti.com

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here