लोकसभा ने गुरुवार को दूसरी बार मुस्लिम समाज में तीन बार तलाक बोलकर तलाक देने की कुरीति के विरुद्ध संशोधित विधेयक पारित कर दिया। लेकिन इस मुद्दे पर लोकसभा के अधिकांश विपक्षी सदस्यों ने बहिष्कार किया। उनका मुख्य विरोध इसे अपराध बनाने को लेकर है। तीन तलाक की कुप्रथा पर तो वे भी रोक चाहते हैं, लेकिन अपने संशोधनों पर विचार करने के लिए उनकी मांग थी कि इसे संयुक्त प्रवर समिति के पास भेज दिया जाए। लोकसभा से पारित मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण बिल 2018 को अब राज्यसभा में रखा जाएगा, जहां पहले यह पारित नहीं हो सका था।

प्रस्तावित कानून में तीन तलाक को गैर जमानती अपराध माना गया है। लेकिन मजिस्ट्रेट पीड़िता का पक्ष सुनकर सुलह करा सकेंगे। साथ ही, जमानत भी दे सकेंगे। पीड़िता मुआवजे की हकदार होगी और तलाक देने वाले पति को तीन वर्ष के कारावास की सजा दी जा सकेगी। उच्चतम न्यायालय ने अगस्त 2017 में 1400 साल पुरानी तलाक–ए-बिद्दत प्रथा को गैर कानूनी ठहराते हुए सरकार से कानून बनाने को कहा था। दिसम्बर 2017 में सरकार ने लोकसभा में यह विधेयक पारित कराया, लेकिन राज्यसभा में यह अटक गया।

सितम्बर 2018 में सरकार ने इस पर अध्यादेश जारी कर दिया। अध्यादेश की अवधि की समाप्ति पर इसे संसद में फिर से रखना जरूरी था। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस कुप्रथा के विरुद्ध कानून चाहते हैं तो इस पर राजनीतिक ड्रामा नहीं किया जाना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि इस प्रथा पर प्रभावी तरीके से रोक कैसे लगाई जा सकती है। अपराध की जगह इसे सिविल मामला बनाए जाने से इस पर अंकुश लगाना बहुत कठिन हो जाएगा। यह बहुत व्यावहारिक भी नहीं है।

दरअसल, इस सियासी ड्रामे की बड़ी वजह विपक्ष की यह धारणा है कि भारतीय जनता पार्टी इस कानून के जरिए मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के एक वर्ग में अपनी पैठ बनाना चाहती है और 2019 में होने जा रहे लोकसभा के चुनाव में इसका लाभ उठाना चाहती है। उन्हें लगता है कि इससे मुस्लिम महिलाओं के साथ ही भारतीय जनता पार्टी को अपने हिन्दू वोट बैंक को पुख्ता करने में भी मदद मिलेगी। लेकिन विपक्ष संभवत: यह सही-सही आकलन नहीं कर पाया है कि इस विधेयक का विरोध करने से उसे कितना फायदा मिल पाएगा।

राज्यसभा में अतीत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जरूरी है कि समाज सुधार के इस प्रयास पर सर्वसम्मति बनाने के प्रयासों को तेज किया जाए। इस प्रक्रिया पर रूढि़वादी और कट्टरपंथी विचारों की छाया नहीं पड़नी चाहिए। कम से कम धर्मनिरपेक्षता में अपनी आस्था व्यक्त करने वाले दल भी ऐसे संविधान विरोधी बयानों को कोई जगह नहीं देंगे कि मुसलमानों के लिए कोई कानून मान्य नहीं है।

मुसलमान सिर्फ कुरान को मानते हैं। ध्यान रहे कि हिन्दू समाज में भी कानून के जरिए कई कुप्रथाओं पर रोक लगाई गई है। इनमें सती प्रथा और बाल विवाह प्रमुख हैं। आशा की जानी चाहिए कि सभी राजनीतिक दल समाज सुधार की ओर बढ़ते प्रगतिशील कदमों को रोकने के बजाय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के आलोक में विचार करेंगे और प्रस्तावित विधेयक को उच्च सदन में फिर से अटकाने की कोशिश नहीं करेंगे।

अनिल गुप्ता

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