आगरा पुलिस को 15 वर्षीय हाईस्कूल की एक छात्रा की हत्या का राज छह दिन के भीतर खोलने में सफलता मिली है। उजागर राज ने न केवल सबको झकझोर कर रख दिया वरन समाजशास्त्रियों को आज के समाज के नैतिक पतन पर गंभीर चिंतन-मनन करने के लिए विवश कर दिया है। गत 18 दिसम्बर को अपने स्कूल से साइकिल पर लौट रही संजलि नामक छात्रा को उसके सगे चचेरे भाई ने ही अपने दो रिश्तेदार युवकों के साथ पेट्रोल छिड़क कर जला डाला।

एक दिन बाद उसकी दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में मौत हो गई। इस मामले में जब हत्यारोपी को लगा कि वह घिर गया है और पुलिस से बच नहीं पाएगा तो उसने अगले दिन आत्महत्या कर ली। अब तक की पुलिस जांच से यह स्पष्ट हो गया है कि इन अभियुक्तों ने एक अपराध धारावाहिक (क्राइम सीरियल) से प्रेरित होकर यह जघन्य कांड किया।

आगरा से करीब 11 किलोमीटर दूर मलपुरा के पास लालऊ ग्राम में हुए इस लोमहर्षक हत्याकांड ने सारे देश का ध्यान खींचा। मलपुरा वह स्थान है जहां पर सेना का पैरा ड्रॉपिंग जोन है। राजनीतिक दलों ने इसे कानून और व्यवस्था का मामला बताते हुए स्थानीय पुलिस को कड़ी आलोचना के केन्द्र में ले लिया। हत्या का मामला निश्चित ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत संज्ञेय अपराध है। लेकिन पुलिस की भूमिका सदैव अपराध हो जाने के बाद शुरू होती है।

पुलिस के सामने उस वक्त साक्ष्य जुटाते हुए जांच को सार्थक परिणति तक पहुंचाने की चुनौती होती है। ऐसे नाजुक समय में जब उसके मनोबल को ऊंचा बनाए रखने की बहुत जरूरत होती है, ऊलजलूल आरोपों से विवेचना में बाधा ही पहुंचती है। इस मामले में भी यही हुआ। राजनीतिक दलों ने अपराध के इस मामले को राजनीतिक रंग देना शुरू कर दिया। चूंकि हत्याकंड की शिकार किशोरी दलित जाति की थी।

इसलिए राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों ने इसे दलित-सवर्ण का मामला बनाने का प्रयास किया। गनीमत रही कि समय रहते पुलिस ने मामले को सुलझा लिया, अन्यथा जातीय तनाव उत्पन्न हो सकता था। सवाल यह उठता है कि क्या इस मामले को और ऐसे ही अन्य मामलों को सिर्फ कानून एवं व्यवस्था की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए? वस्तुत: यह अपराध समाज में गिरते नैतिक स्तर की ओर साफ इशारा करता है।

इन कारणों में अपराध धारावाहिक ने जो भूमिका निभाई है, उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। संस्कारक्षम वातावरण बनाने के दायित्व को सबको मिल जुलकर ही निभाना होगा। आज जब हर परिवार में टीवी और हर हाथ में मोबाइल है, तो प्रसारित सामग्री की गुणवत्ता और उसके हर पहलू पर विचार समय की मांग है। प्राचीन भारतीय जीवन शैली में यम-नियमों के पालन से निर्मल चित्त के निर्माण पर जोर दिया जाता था।

यह प्रक्रिया आधुनिक काल में रुक गई है। इसे परिवार और स्कूल दोनों स्तरों पर फिर से शुरू करने की जरूरत है। विकास की अंधी दौड़ में जीवन मूल्य पीछे छूट रहे हैं, जबकि मानव जीवन के लिए भौतिक विकास से अधिक आवश्यक आध्यात्मिक विकास है। इसके बिना जो सामाजिक व्यवस्था आकार लेगी संजलि हत्याकांड उसका ज्वलंत उदाहरण है।

अनिल गुप्ता

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