घटिया व मिलावटी खाद्य वस्तुएं, पीने लायक पानी का अभाव और मानकहीन दवाओं के विरुद्ध सरकार से सख्त कार्रवाई की अपेक्षा अत्यंत स्वाभाविक है। लेकिन इन मोर्चों पर सरकार का शिथिल रवैया ही देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा नहीं उतरने के कारण पिछले छह वर्ष के दौरान देश से निर्यात की गई दवाओं की 14 लाख से अधिक खेप वापस लौटाई जा चुकी हैं।

देश की अधिकांश आबादी को शुद्ध पेयजल की उपलब्धता आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। घटिया व मिलावटी वस्तुओं का बाजार बेरोकटोक जारी है। ऐसा नहीं है कि सरकार इन सब समस्याओं से बेखबर हो। दवाओं की बड़ी संख्या में खेप वापसी के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर का सटीक मानक लाने की जिम्मेदारी वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद को सौंपी गई है। लेकिन शुद्ध पेयजल की उपलब्धता के लिए कोई ठोस योजना सरकार अभी तक नहीं बना पाई है। घटिया व मिलावटी खाद्य वस्तुएं बेचने के खिलाफ कानून हैं, लेकिन वे इतने प्रभावी नहीं हैं कि इस पर पूरी तरह अंकुश लग पाया हो।

दवाओं के अंतरराष्ट्रीय मानक ही न होना सरकार के स्तर पर गंभीर लापरवाही है। इस पर अमल तो मानक मौजूद होने के बाद ही होता। सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि विदेशों से लौटाई गईं दवाओं को घरेलू बाजार में तो नहीं खपाया गया। मध्य एशियाई देशों में खाद्य वस्तुओं में मिलावट पर कड़ी सजा के प्रावधान हैं। हम उनसे सीख ले सकते हैं।

इस क्षेत्र में नवीनतम शोधों के अनुरूप कानूनों में संशोधन की भी बहुत जरूरत है। उदाहरण के लिए दूध में निर्धारित मात्रा तक मैलेनिन मिलाने की इजाजत विश्व में कहीं नहीं है। लेकिन हमारे यहां क्यों है ? समझ से परे है। इसी प्रकार, पाम ऑयल को वैज्ञानिक कार्सीनोजेनिक यानी कैंसर पैदा करने वाला बता चुके हैं। इसके बावजूद हमारे यहां इसका विभिन्न उत्पादों में धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है।

सरकार ने सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जैनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने की दिशा में स्वागतयोग्य कदम उठाए हैं। लेकिन यह ख्याल रखना पड़ेगा कि ये दवाएं स्तरहीन न हों। दवाओं और खाने-पीने की चीजों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता क्योंकि इनका सम्बन्ध सीधे मनुष्य के जीवन से है। उपभोक्ता  मंत्रालय का यह कहना सही है कि फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए तैयार हो रहे नये मानक सिर्फ निर्यात के लिए ही नहीं बल्कि घरेलू खरीदारों के लिए भी फायदेमंद होंगे।

यहां यह कहना प्रासंगिक होगा कि यह तभी संभव हो पाएगा जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों में कोई भेद नहीं किया जाए। सरकार को मानकों के अनुरूप आम जन को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए ऐसी महत्वाकांक्षी योजना बनानी चाहिए जिससे तथाकथित मिनरल वाटर के कारोबार पर रोक लग सके। इसके लिए नदियों में अविरल जलधारा का प्रबन्ध और उन्हें प्रदूषण मुक्त कराना सहायक हो सकता है। भूगर्भ जल को रीचार्ज करने के पारम्परिक तरीकों को फिर से याद करना भी फलदायक होगा। स्वस्थ राष्ट्र के लिए इन मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी ही होगी। अन्यथा राष्ट्र के स्वास्थ्य से हो रहे खिलवाड़ को रोका नहीं जा सकेगा।  

अनिल गुप्ता

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