प्रदूषण के कारण देश की राजधानी का वायु गुणवत्ता सूचकांक 500 अंक के पार यानी आपातस्थिति में पहुंच गया है। साथ ही, वायु में घुले प्रदूषक कणों (पार्टीकुलेट मैटर) का भी स्तर आपात स्थिति में पहुंच गया है। जनजीवन के स्वास्थ्य के लिए यह खतरे की घंटी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 1989 की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली का प्रदूषण के मामले में विश्व में चौथा स्थान है। दिल्ली में 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण औद्योगिक इकाइयों के कारण है, जबकि 70 प्रतिशत वाहनों के कारण है। खुले स्थान और हरे क्षेत्र की कमी के कारण यहाँ की हवा साँस और फेफड़े से सम्बन्धित बीमारियों को बढ़ाती है।

भारतीय संविधान में पर्यावरण का स्पष्ट उल्लेख वर्ष 1977 में किया गया। उसी वर्ष 42वें संविधान संशोधन द्वारा केन्द्र तथा राज्य सरकारों के लिए पर्यावरण को संरक्षण तथा बढ़ावा देना आवश्यक कर दिया गया। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में अनुच्छेद 48ए जोड़ा गया। इस अनुच्छेद के अनुसार ‘सरकार पर्यावरण के संरक्षण एवं सुधार और देश के वनों तथा वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए प्रयास करेगी।

इसी संशोधन के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 51ए (जी) भी जोड़ा गया, जिसके तहत प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह ‘प्राकृतिक वातावरण जिसमें वन, नदियों तथा वन्यजीव शामिल हैं, के संरक्षण तथा सुधार के लिए कार्य करे तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।’ लेकिन प्रदूषण की विकट समस्या का समाधान मात्र इस संशोधन से नहीं हो सकता। हांलांकि इसके बाद वायु प्रदूषण पर रोकथाम के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं।

इन कदमों में खतरनाक, हानिकारक, भारी और बड़े उद्योगों को अन्यत्र स्थानांतरित करने सम्बन्धी प्रस्ताव और वाहनों की आयु का निर्धारण और सीसा रहित पेट्रोल के साथ बी6 श्रेणी के वाहनों का निर्माण शामिल है। उक्त प्रस्ताव निश्चित ही प्रदूषण की रोकथाम की दिशा में उपयोगी होंगे, लेकिन इन पर क्रियान्वयन की गति अत्यंत धीमी है। हांलांकि सरकार का दावा है कि 20 वर्ष से ऊपर आयु के करीब 10 हजार वाहन चलने बंद हो गए हैं। लेकिन 25 मई 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या 1 करोड़ 5 लाख 67 हजार 712 थी। वाहनों की इस संख्या के मुकाबले सड़क से हटाए गए वाहनों की संख्या काफी कम है।

अब सरकार के लिए अंधाधुंध औद्योगीकरण एवं विकास पर मानव जीवन के परिप्रेक्ष्य में गम्भीरतापूर्वक विचार करने का आगाहकारी समय आ गया है। क्या यह जरूरी है कि रोजगार के सारे स्रोत देश की राजधानी में ही विकसित किए जाएं ? क्या देश के विकास का रोड मैप इस प्रकार नहीं बनाया जा सकता कि लोगों को रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के लिए अपने जनपद से बाहर न जाना पड़े।

प्राचीन भारत की ग्राम्य व्यवस्था में ग्राम आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होते थे। इसके लिए जीवन शैली पर भी गंभीर मंथन समय की मांग है, क्योंकि विकास का सही पथ तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता जब तक हमारा जीवन उद्देश्य और शैली तय न हो। देश की शांति, सुख और समृद्धि के लिए स्वदेशी सूझबूझ से काम किया जाए तो ग्रामों से शहरों की ओर चल रहा पलायन रोका जा सकेगा। यह रुकने पर बड़े शहरों में फ्लाई ओवर, अंडर पास, मेट्रो के संजाल और बहुमंजिले आवासों की अट्टालिकाएं खड़ी करने की जरूरत काफी कम तो की ही जा सकेगी।   

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