राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के एक फैसले बाद अब केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि गंगा के ज्यादातर क्षेत्र प्रदूषित ही बने हुए हैं। इस वर्ष मानसून से पहले और मानसून के बाद कुल 39 चिन्हित स्थानों में सिर्फ हरिद्वार बैराज ही ऐसा स्थान पाया गया है, जहां गंगा नदी का पानी साफ रहा। उच्चतम न्यायालय के हाल के आदेश के बाद बोर्ड ने अपनी यह रिपोर्ट सार्वजनिक की है।

एनजीटी ने गंगा नदी की साफ-सफाई पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा था कि नदी की हालात बहुत ज़्यादा खराब है। नदी की सफाई के लिए शायद ही कोई प्रभावी कदम उठाया गया है। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि आधिकारिक दावों के बावजूद गंगा के पुनर्जीवन के लिए जमीनी स्तर पर किए गए काम पर्याप्त नहीं हैं और स्थिति में सुधार के लिए नियमित निगरानी की जरूरत है।

सरकार का दावा है कि राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमजीसी) ने नदी की सफाई और गंगा संरक्षण के लिए 17484.97 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से गंगा की घाटी वाले राज्यों में 105 परियोजनाएं मंजूर की हैं। सीवरेज बनाने संबंधी इन परियोजनाओं में से 26 पूरी हो चुकी हैं, बाकी परियोजनाएं कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। कुल मिला कर वर्ष 2014 से जून 2018 तक गंगा नदी की सफाई के लिए 3,867 करोड़ रुपये से अधिक राशि खर्च की जा चुकी है।

गंभीर सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी धनराशि के खर्च होने के बावजूद गंगा के निर्मलीकरण के प्रयासों के वांछित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे ? हकीकत तो यह है कि बीते चार वर्षों में कानपुर, प्रयागराज संगम और वाराणसी में प्रदूषण में कोई कमी नहीं देखी गई। इतना ही नहीं, 2017-18 के दौरान उत्तराखण्ड में जगजीतपुर और उत्तर प्रदेश में कानपुर, प्रयागराज और वाराणसी में प्रदूषण 2014-15 से अधिक पाया गया।

इस तथ्य की अनदेखी की जा रही है कि नदी की जल धारा में स्वत:मार्जन की क्षमता होती है। जलधारा के समुचित वेग को बनाए रखने के लिए जो प्रयास किए जाने चाहिए, उसके प्रति गंभीर लापरवाही देखी जा रही है। गंगा का अधिकांश पानी या तो टेहरी जैसे बडे बांधों में रोक लिया जाता है या सिंचाई और हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाओं में खींच लिया जाता है। फलस्वरूप, नदी में पानी ही नहीं रहता । वेगवान जलधारा स्वप्न बन जाती है।

दूसरी ओर, नगरों का सीवर, नाले और औद्योगिक अपशिष्ट को गंगा में सीधे गिराया जा रहा है। विभिन्न मल शोधन परियोजनाओं पर इतनी मंथर गति से काम हो रहा है कि धैर्य का बांध अब टूट रहा है। कुछ अच्छे स्वयंसेवी संगठनों ने भी गंगा की अविरल जलधारा और निर्मलीकरण के काम में रूचि दिखाई है, लेकिन उनके सुझावों पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है। यह बहुत अच्छा सुझाव है कि गंगा मात्र नदी नहीं अपितु अधिष्ठात्री देवी हैं, ऐसा पूज्य भाव फिर से जन-जन के हृदय में उत्पन्न किया जाए।

ऐसा करने से गंगा को कूड़ेदान में बदलने की प्रक्रिया निरंकुश प्रक्रिया पर रोक लग सकेगी। इसके लिए जनजागरण आवश्यक है और इस कार्य में स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि गंगा का संकट सिर्फ इस नदी का संकट नहीं है। इसके अस्तित्व पर संकट से पूरी गांगेय भूमि पर जीवन-यापन कर रहे लोगों के जीवन पर संकट गहरा जाएगा।

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