संसद का शीतकालीन सत्र शोर-शराबे और व्यवधानों के कारण पिछले पांच दिन से लगातार चल नहीं पा रहा है। संसद के निचले सदन ने केवल सोमवार को उभयलिंगी व्यक्तियों के अधिकारों पर एक विधेयक पारित किया। इस हालत से तंग आकर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने मंगलवार को सदस्यों से कहा कि विदेश के शिष्ट मंडल आते हैं और लोग पूछते हैं कि आपके यहां क्या हो रहा है। स्कूली बच्चों के संदेश आ रहे हैं कि हमारे स्कूल बेहतर चलते हैं।

क्या अब हम स्कूली बच्चों से भी गए-गुजरे हो गए हैं ? दरअसल, यह लोकसभा अध्यक्ष की अपने विशिष्ट अंदाज में हालात पर उचित टिप्पणी है। जहां तक विदेश के शिष्ट मंडलों के सदस्यों की टिपप्णी का सवाल है, यह कहना उचित होगा कि संसदीय लोकतांत्रिक देशों में हमारा देश अकेला नहीं है जहां संसद में भारी शोर-शराबा होता हो। हमारी शासन प्रणाली का साम्य ब्रिटिश मॉडल से है।

वहां भी ऐसे ही शोर-शराबे होते हैं। ऐसा कहने का कतई यह अर्थ नहीं है कि संसद में व्यवधान होने चाहिए और कानून बनाने के काम की उपेक्षा होनी चाहिए। बल्कि हमें राष्ट्रपति शासन प्रणाली वाली अमेरिकी संसद से प्रेरणा लेनी चाहिए जहां  प्राय: इतना शोर-शराबा और व्यवधान नहीं होता।

क्या इसका कारण सिर्फ शासन प्रणाली के अंतर में है ? या हमारे राजनेताओं की प्रकृति में ही शोर-शराबा करना है। अब तक के अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि इसके मूल में राजनेताओं द्वारा सत्ता को राष्ट्र हित के मुकाबले उपर रखने की प्रवृत्ति है। सत्ता बदल जाने के बाद शोर-शराबे के सिर्फ खिलाड़ी बदल जाते हैं।

इस सत्य को रेखांकित करते हुए पिछले मानसून सत्र में लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सांसदों को लिखे अपने अत्यंत भावुक पत्र में कहा था कि सदस्यों का यह तर्क माने जाने पर कि अतीत में दूसरे दल भी व्यवधान करते रहे हैं, तो इस दुश्चक्र को कभी समाप्त नहीं किया जा सकेगा।

उनका यह कहना बिल्कुल ठीक है। पर इस स्थिति में बदलाव फिलहाल होता नहीं दिखाई दे रहा। सभी जानते हैं कि संसद सत्र के दौरान प्रति मिनट करीब ढाई लाख रुपए का खर्च होता है। यह देश की जनता की गाढ़े पसीने की कमाई है, जिसका ख्याल किसी को नहीं है।

जिन मुद्दों पर इस समय संसद में हंगामा हो रहा है, उनमें राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग, कावेरी नदी के पानी का बंटवारा, आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा और 1984 के सिख दंगे है। इन मुद्दों पर चर्चा के लिए सत्ता और विपक्ष दोनों को एक दूसरे को मतभेद के बावजूद सुनना और समझना होगा।

यह बहुत आसान नहीं है, पर अपने दलीय स्वार्थों से ऊपर उठा जाए तो यह असम्भव भी नहीं है। राष्ट्र अपने राजनेताओं को इस दृष्टि से देख रहा है कि कोई विदेशी हम पर यह कह कर कोई उंगली न उठा सके कि आपकी संसद में यह क्या हो रहा है।

लोकसभा के लिए पहली बार निर्वाचित होने के बाद लोकसभा में अपने प्रथम प्रवेश के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा की सीढ़ियों पर दण्डवत प्रणाम करते हुए से लोकतंत्र का मंदिर कहा था। आज उस भक्तिभाव को साबित करने का समय आ गया है।  यह तभी होगा जब सत्ता और विपक्ष दोनों इसे लोकतंत्र का मंदिर मानें।

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