आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर आजकल गठबंधन और महागठबंधन की राजनीति जोरों पर है। भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) दोनों ही के सहयोगी दलों के नेताओं के बयानों पर गौर करें तो आप पाऐंगे कि ये सभी लोकहितकारी वैचारिकी से दूर केवल चुनाव में जीत-हार के गणित का पूर्वानुमान लगा कर अपनी दिशा तय करने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन की अफवाहों का बाजार गर्म है और इस गठबंधन से कांग्रेस को बाहर रखने की बातें की जा रही हैं। फिलहाल, बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने राज्य में सपा-बसपा के बीच सीट समझौते की खबरों को खारिज किया है।

इस बीच, एनडीए की घटक लोकजनशक्ति पार्टी के संसदीय सचिव चिराग पासवान ने कमजोर पड़ रही भाजपा के सामने साथ छोड़ने की परोक्ष धमकी दे दी है। सत्ताधारी गठबंधन से पीडीपी, तेलुगु देशम और रोलोसपा पहले ही बाहर जा चुके हैं।

हालांकि तेलुगु देशम के नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एनडीए का साथ आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने के विरोध में छोड़ा था, लेकिन राजनीति की गहरी समझ रखने वालों का कहना है कि उन्होंने यह कदम राज्य में अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने की खातिर उठाया था जो भारतीय जनता पार्टी के साथ बने रहने पर संभव नहीं हो पा रहा था।

जम्मू-कश्मीर में भाजपा के समर्थन से जब सरकार पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती की सरकार बनी थी, तब स्पष्ट था कि दोनों दलों में कोई वैचारिक समानता नहीं थी। सरकार न चल पाने की यह सबसे बड़ी वजह थी। अब वहां छह महीने के राज्यपाल शासन के बाद राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया है। यहां अब राज्य विधानसभा के चुनाव होने की प्रतीक्षा की जा रही है।

सिर्फ सत्ता की खातिर वोट की राजनीति का सिलसिला रुकना चाहिए। राजनीतिक दल देश में खुशहाली बढ़ाने और इसके सर्वांगीण विकास के उपायों पर काम करने के लिए गंभीर विचार मंथन और सहकार की राजनीति करते हुए नहीं दिखाई देते, जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। परिपक्व लोकतंत्र तभी कहा जा सकेगा जब राजनेता अपनी मेधा और प्रतिभा का प्रदर्शन राष्ट्रीय समस्याओं के निदान के रास्ते ढूंढने में करें।

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठनों से निर्देशित अर्थव्यवस्था और पाश्चात्य संस्कृति के अनुगमन से आकार ले रही नई सामाजिक व्यवस्था भारत को कहां ले जाएगी-इस पर सबको मिल जुलकर चिंतन करना होगा जिससे अपनी गौरवशाली एवं शाश्वत जीवनशैली को राष्ट्र बचाए रखे। यह समझने की बहुत ज्यादा जरूरत है कि राजनीति अनेक अन्य कार्यों की भांति ही एक कार्य हैं।

इसके मोह में हम बंधुत्व का भाव और मातृभूमि की सेवा छोड़ दें, यह कतई अभीष्ट नहीं है।  आगे होने वाले चुनाव के लिए गठबंधन विचारधारा के आधार पर होते हैं, तभी यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दल जनता को धोखा नहीं दे रहे हैं। यह विचारणीय है कि क्या राजनीति टकराव के रास्ते पर चलकर ही की जा सकती है? क्या यह सहकार से नहीं हो सकती ?

 

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