अमर भारती : केंद्र सरकार ने राफेल डील को लेकर फैसले से जुड़ी प्रक्रियाओं की जानकारी सार्वजनिक कर दी। केंद्र सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राफेल सौदे पर मई 2015 से अप्रैल 2016 के बीच भारतीय वार्ता दल (आईएनटी) की 74 बैठक हुईं जिनमें से 26 फ्रांसीसी पक्ष के साथ थीं। आईएनटी का गठन 36 राफेल विमानों की खरीद के लिए नियम व शर्तों पर बातचीत के लिए किया गया था।

आईएनटी की अध्यक्षता वायुसेना के उप प्रमुख (डीसीएएस) कर रहे थे और इसमें संयुक्त सचिव और अधिग्रहण प्रबंधक (एयर), संयुक्त सचिव (रक्षा ऑफसेट प्रबंधन शाखा), संयुक्त सचिव और अतिरिक्त वित्तीय सलाहकार, वित्त प्रबंधक (एयर), सलाहकार (लागत) और सहायक वायुसेना प्रमुख (योजना) भारत सरकार की तरफ से सदस्य के तौर पर शामिल थे।

इसमें कहा गया कि फ्रांसीसी पक्ष का नेतृत्व महानिदेशक आयुध (डीजीए), फ्रांस सरकार का रक्षा मंत्रालय कर रहे थे। केंद्र ने सर्वोच्च अदालत को बताया, ‘‘आईएनटी और फ्रांसीसी पक्ष के बीच बातचीत मई2015 में शुरू हुई और अप्रैल 2016 तक जारी रही। बातचीत के दौरान कुल 74 बैठकों में से 48 बैठकें आईएनटी की आंतरिक थी जबकि 26 बैठकें फ्रांसीसी पक्ष के साथ हुईं।

खबरों के अनुसार 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध में किए गए फैसले के ब्योरे वाले दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंपे। दस्तावेजों में कहा गया कि फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत तकरीबन एक साल चली और समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी ली गई।

केंद्र सरकार ने हलफनामे में बताया कि इस डील को फाइनल करने से पहले दोनों देशों (भारत और फ्रांस) के बीच 74 बैठकें हुई थीं। खास बात ये है कि केंद्र सरकार ने राफेल सौदे पर सुप्रीम कोर्ट में ऐसे समय में हलफनामा दाखिल किया है, जब विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलवर हैं और विमान की कीमत सार्वजनिक करने का दबाव बना रहे हैं।

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी सीधे-सीधे उद्योगपति अनिल अंबानी का नाम लेकर इस सौदे में भ्रष्टाचार का बड़ा आरोप लगा रहे हैं। मामले की सुनवाई सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच कर रही है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वह डिफेंस फोर्सेज के लिए राफेल विमानों की उपयुक्तता पर कोई राय नहीं देना चाहते और न ही कोई नोटिस जारी कर रहे हैं। कोर्ट केवल फैसला लेने की प्रक्रिया की वैधता जानना चाहता है।

इस सौदे का विरोध कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी का कहना है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से विमान खरीद रही है जबकि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान इसकी कीमत 526 करोड़ रुपये तय हुई थी।

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