अमर भारती : देश की सबसे बड़ी डील, राफेल डील पर फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति मैक्रो ने बड़ा बयान दिया है, उन्होंने इस विवाद पर सीधे तौर पर कोई भी टिप्पणी न करते हुए, कहा कि जब भारत और फ्रांस के बीच 36 विमानों के लिए लाखों डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर किए जा रहें थे तब मैं सत्ता में नहीं था।

भारतीय मीडिया द्वारा सवाल पूछा गया, “क्या भारत सरकार ने अनिल अंबानी के रिलायंस डिफेंस को भारत के साथी के रूप में लेने के लिए फ्रांसीसी सरकार या राफेल के निर्माता दासॉल्ट को प्रस्तावित किया था, जैसा कि पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद द्वारा दावा किया गया है।”

मैक्रो का आगे कहना है,”हमारे नियम बहुत स्पष्ट है, यह दो सरकारों के बीच हुआ सौदा है। जिस वक्‍त यह सौदा हुआ था उस समय मैं सत्ता में नहीं था। हमारे नियम बहुत स्पष्ट हैं और यह सौदा भारत और फ्रांस के बीच एक सैन्य और रक्षा गठबंधन के व्यापक ढांचे का हिस्सा है।”

राफेल डील पर विवाद तब और बढ़ गया जब फ्रेंच मीडिया ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद द्वारा यह दावा किया गया था कि 58,000 करोड़ रुपये के राफेल जेट विमान सौदे में भारत सरकार ने रिलायंस डिफेंस को दसॉ एविएशन का साझेदार बनाने का प्रस्ताव दिया था। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे में फ्रांस के पास कोई विकल्प नहीं था।

ओलांद की यह टिप्पणी भारत सरकार के रूख से अलग है, ओलांद के इस बयान पर भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के इस बयान की जांच हो रही है, जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार ने एक खास संस्था को राफेल में दसॉ एविएशन का साझेदार बनाने के लिए जोर दिया।

मंत्रालय के प्रवक्ता ने आगे यह भी कहा, ‘एक बार फिर इस बात को जोर देकर कहा जा रहा है कि इस वाणिज्यिक फैसले में न तो सरकार और न ही फ्रांस की सरकार की कोई भूमिका थी।

पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पेरिस दौरे के समय राफेल डील की घोषणा की थी, भारत ने करीब 58,000 करोड़ रुपए की लागत से 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पिछले साल सितंबर में फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी समझौते पर दस्तखत भी किए थे। इन विमानों की आपूर्ति सितंबर 2019 से शुरू होने वाली है।

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