लखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलॉम सेंटर में शुक्रवार को मॉलिक्यूलर बायोलॉजी इकाई, सेंटर फॉर एडवासं रिसर्च द्वारा एचपीवी टेस्ट पर जागरूकता संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उद्घाटन कुलपति प्रो एमएलबी भट्ट ने किया। इस मौके पर कुलपति ने कहा कि किसी भी तरह के कैंसर की संभावना को पहले से पहचान लेने पर उसके इलाज में काफी सहूलियत रहती है। पहले पहचान हो जाने से मरीज में कैंसर को पनपने से पहले रोका भी जा सकता है। इस लिहाज से यह कार्यक्रम बहुत ही आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि इसकी जांच स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में 30 वर्ष के ऊपर की महिलाओं में शुरू करना है। इसके लिए हमें महिलाओं को जागरूक करना पड़ेगा कि वो इस जांच को कराएं और सर्विक्स के कैंसर को पनपने से पहले रोकें।कार्यक्रम में मॉलिक्यूलर बायोलॉजी इकाई, सेंटर फॉर एडवासं रिसर्च की सह-आचार्या डॉ. नीतू सिंह ने बताया कि 30 से 65 वर्ष की उम्र की महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर की समस्या होती है। इसलिए 30 वर्ष पार कर चुकी महिलाओं को एचपीवी टेस्ट नियमित कराना चाहिए।

डॉ नीतू सिंह ने बताया कि इसकी रोकथाम और इसकी पहचान के लिए भारत सरकार द्वारा एनएचएम के अंतर्गत 30 से 65 वर्ष की उम्र की महिलाओं का विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार वीआईए की जांच की जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विकासशील देशों की महिलाओं में सर्विक्स के कैंसर की जल्द पहचान के लिए वी.आई.ए. जांच का मानक रखा गया है।

डॉ नीतू सिंह ने बताया कि जिन महिलाओं का वी.आई.ए. टेस्ट पॉजिटिव आता है, उन महिलाओं का एचपीवी टेस्ट कराया जाता है। किन्तु कुछ केसों में वीआईए जांच द्वारा एचपीवी वायरस का पता नहीं चल पाता है। ऐसी परिस्थितियों में एचपीवी टेस्ट के माध्यम से एचपीवी वायरस का पता लागया जाता है। इसलिए सर्विक्स के कैंसर के मुख्य कारण एचपीवी वायरस की जल्द पहचान के लिए डाइजीन एचपीवी टेस्ट का होना जरूरी है।

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