नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती ताकत की वजह से चीन की परेशानी बढ़ गई है। इसी हफ्ते शंघाई सहयोग संगठन की बैठक होने वाली है। भारत भी अब इस संगठन का हिस्सा है और भारत की तरफ से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस समिट में हिस्सा लेंगी। एससीओ में भारत की एंट्री से चीन में मायूसी बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि एससीओ में भारत के शामिल होने के बाद चीन का दबदबा कम होगा। कई मुद्दों पर अब भारत खुलकर विरोध कर सकता है जो भारत के हित में न हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘भारत के SCO में शामिल होने के बाद चीन की भूमिक निश्चित तौर पर कमजोर होगी क्योंकि भारत चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल को पूरी तरह सपॉर्ट नहीं करता है।’ इसके साथ-साथ भारत SCO के तहत आने वाली पेइचिंग की अन्य पहलों का भी विरोध कर सकता है, अगर वे भारत के हित में न हों।’ बता दें कि एससीओ की तुलना अमेरिका और यूरोपिय देशों के नॉर्थ अटलांटिक ट्रीट्री ऑर्गनाइजेशन (NATO) से भी की जाती है। इस संगठन का काम सेंट्रल एशिया और अफगानिस्तान के इलाके में शांति बनाए रखना है। यह एक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग का संगठन है।

इस संगठन को रूस और चीन ने मिलकर बनाया था। इसमें अन्य यूरोपीय देश और एशिया के देश शामिल हैं। संगठन का मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया में सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर सहयोग बढ़ाना है। इस संगठन में चीन, रूस, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिस्तान थे। अब पहली बार भारत और पाकिस्तान भी इस संगठन के पूर्णकालिक सदस्य बने हैं। गुरुवार से रूस के सोची में SCO समिट होने वाली है। ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ के मुताबिक, पूर्णकालिक सदस्य के तौर पर अब भारत के पास चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे सहित अन्य पेइचिंग समर्थित पहलों की आलोचना का अधिकार है। इतना ही नहीं भारत SCO समिट का इस्तेमाल एक सार्वजनिक मंच के तौर पर भी कर सकता है जहां से वह पेइचिंग की गतिविधियों के पीछे छिपी मंशा पर सीधे सवाल कर सकता है।