हिमाचल प्रदेश की राजनीति में रिवाज बदलने का भाजपाई दावा और कांग्रेस के कपड़े

मंगलवार को नई दिल्ली में नालागढ़ के कांग्रेस विधायक लखविंद्र राणा को भाजपा की सदस्यता पर्ची देते भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह । साथ हैं सीएम जयराम ठाकुर और पवन काजल।

हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के चार कार्यकारी अध्यक्षों में से एक रहे पवन काजल और एक अन्य कांग्रेस विधायक लखविंद्र राणा अंतत: भाजपा में आ गए। मंगलवार देर सायं उन्हें पद से हटा दिया गया ताकि भाजपा यह न कह सके कि वह कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष को ले उड़ी। बुधवार को जब दोनों भाजपा में शामिल हो गए तो कांग्रेस की अनुशासन समिति ने दोनों को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसे संगठन की नियमावली कहें या सांप गुजरने के बाद लकीर पीटना, जो पार्टी ही छोड़ गए, उन्हें छह वर्ष के लिए निष्कासित किया गया। छह वर्ष संभवत: इसलिए कि शायद उसके बाद की संभावनाएं जीवित रहें। भाजपा को विश्वास है कि कांग्रेस को ऐसे कई पत्र और लिखने पड़ेंगे, क्योंकि आने वाले दिनों में कई और कांग्रेस पदाधिकारी भाजपा में आ सकते हैं। तकनीकी रूप से देखें तो पवन काजल और लखविंद्र राणा की घर वापसी हुई है। दोनों भाजपा या उसके अन्य संगठनों में पदाधिकारी रहे हैं। जब अपने हित और पार्टी के हितों में टकराव हुआ तो दोनों कांग्रेस में चले गए थे। चुनावी वर्ष में यह भाजपा का कांग्रेस को बड़ा झटका है। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भाजपा का दावा है कि इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में जनता रिवाज बदलेगी। यानी प्रदेश में भाजपा पुन: सरकार बनाएगी। अपवाद अपनी जगह, किंतु हर सरकार को सत्ता विरोधी गुस्से का भय होता ही है। जनता से अधिक कोई नहीं जानता कि किसे शासन सौंपना है। इसके बावजूद यदि कोई ऐसा दावा कर रहा है तो उसका एक कारण राज्य के प्रतिपक्ष कांग्रेस की कारगुजारी भी है। मंत्रियों के प्रति क्रोध या क्षोभ है या नहीं, विधायकों के प्रति नाराजगी कितनी है, कितनी सीटों पर भाजपा चेहरे बदलेगी, यह सब बाद की बात है, किंतु कांग्रेस इस समय अपने आप से सशंकित रहते हुए भाजपा को लाभ देती प्रतीत हो रही है। कांग्रेस की शंका के प्रमाण अनेक हैं। बीते दिनों नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री को भी यह कहना पड़ा कि यदि टिकटों के बंटवारे में कुछ लूटपाट हुई तो वह कांग्रेस की राजनीति से संन्यास ले लेंगे। एक चिट्ठी आई है कांग्रेस प्रभारी राजीव शुक्ला की। लिखा है, सब नेता अलग-अलग जनसभाएं न करें, एक साथ रहें। ऐसा क्यों कहना पड़ा? क्योंकि सबकी ‘अपनी डफली अपना राग’ है। आब्जर्वर भूपेश बघेल और उनके साथी प्रताप सिंह बाजवा के आने पर सभी नेताओं को शिमला बुलाया गया। कांगड़ा से जुड़े एक नेता रास्ते में थे। उन्हें शिमला से फोन आया कि आप सीधे राज्य अतिथिगृह आइएगा.. यहां कमरे की व्यवस्था है, आप वहीं कपड़े बदल कर बैठक में आ जाओ। इन नेता ने कहा, ‘यदि पार्टी का यही हाल रहा तो कपड़े क्या, नेतागण हमारी खाल भी उतार लेंगे।’ उन्होंने ऐसा क्यों कहा? इसके कुछ कारण इसी बैठक में दिख गए। शिमला के बड़े परिवार से संबद्ध और प्रखर वाणी वाले एक युवा नेता पर्यवेक्षकद्वय के साथ जारी उपाध्यक्षों की बैठक में पहुंच गए। बघेल ने कहा कि अनुशासन का ध्यान रखना चाहिए, आप अन्य बैठक में आइए। इस पर युवा विधायक यह कहते हुए चले गए कि ‘इसी ब्यूरोक्रेसी ने कांग्रेस को तबाह किया है।’ उधर, पर्यवेक्षकगण तीन घंटे विलंब से आए तो कुछ नेता यह कहते हुए उठ गए, ‘हम किसी के नौकर नहीं कि बैठे रहें।’ दिवंगत नेता जीएस बाली की जन्म जयंती पर उनकी याद में हुए कार्यक्रम में कांग्रेस प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला भी आए। बाली जिंदाबाद के नारों के शोर के बीच उन्हें जब पत्रकारों से बात करने में कठिनाई आई तो उन्होंने कहा, ‘इन्हें चुप करवाओ भाई, बहुत हो गई बाली जी की चमचागीरी।’ इससे जीएस बाली के अपमान का संकेत तो गया ही, शुक्ला यह रास्ता भी खोल गए कि दिवंगत नेता के सम्मान में नारे लगाना चमचागीरी की श्रेणी में आता है। मान लिया जाए कि जनता इस समय कांग्रेस के साथ है, तो क्या ये दृश्य देखने के बाद जनता अपने विवेक से निर्णय नहीं लेगी? यह भाजपा का काम सरल करने जैसी बात नहीं है? पवन काजल की भाजपा में वापसी और कुछ अन्य का पंक्तिबद्ध होना कांग्रेस के उस सोच को निर्थक सिद्ध कर गया है कि सबको कुछ न कुछ बना दो, कार्यकारी अध्यक्ष भी थोक में बना दो, सब प्रसन्न रहेंगे। सिद्ध हुआ कि जब आलाकमान की अथारिटी डाइल्यूट होती है तो वह राज्यों में भी प्राधिकार को झीना बनाना चाहती है। इसे आत्मविश्वास की अनुपस्थिति भी कहते हैं। कांग्रेस उस ‘वायरल बुखार’ या ‘जुकाम’ का उपचार कर ही नहीं पाई जिस कारण कुछ माह से पार्टी की किसी भी बैठक में पवन काजल जा नहीं सके। सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री की ओर से ‘मुफ्त की रेवड़ी’ विषयक सरोकारों के बीच 300 यूनिट बिजली निश्शुल्क देने का वादा हो या पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की बात या फिर सत्ता में आने पर 18 से 60 वर्ष तक की महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की बात, इनके स्रोत भी सार्वजनिक हों तो विश्वास हो। कांग्रेस के पास अच्छा अवसर है, किंतु भाजपा की तरह शीर्ष नेतृत्व तो दूर, उनके पास सौदान सिंह जैसा सख्त मुख्याध्यापक की छवि वाला संगठक नहीं है, गांव देहात घूमने वाला अविनाश राय खन्ना या संजय टंडन भी नहीं है जो संगठन के लोगों को व्यस्त रखें। आने वाले दिनों में कितने लोग निष्ठाएं बदलते हैं, इधर से उधर जाने पर जमीनी कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया क्या रहती है, कितने बड़े चेहरे स्थान परिवर्तन करते हैं, और उसका प्रदेश की राजनीति पर क्या प्रभाव रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा।