गांधी दर्शन में नैतिकता का आर्थिक पहलू

वास्तव में गांधी जी को लगता था कि मानव को प्रकृति से मात्र उतना ही लेना चाहिए जितनी उसकी आवश्यकता हो। गांधी ने आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की भरपूर आलोचना करते हैं और इसकी कमजोरियों को देखते हुए गंभीर रूप से कई नैतिक प्रश्न भी उठाए हैं। गांधी वास्तव में उपभोग के लिए उत्पादन की वकालत करते हैं तो दूसरी तरफ आज आधुनिक अर्थव्यवस्था में उत्पादन के लिए उत्पादन किया जा रहा है। इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी खामी यह है कि इस तरह तो कभी समाप्त न होने वाली तीखी प्रतियोगिता शुरू हो जाएगी। नतीजतन मानव समाज या हमारा विश्व संघर्ष का अखाड़ा बनकर रह जाएगा। दर्शन गांधी का यह तर्क इतिहास में भी दखल करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है और प्रथम या द्वितीय विश्व युद्ध से भी इसे जोड़ कर देखा जा सकता है। एक तरह से गांधी इस तर्क के माध्यम से साम्राज्यवाद और पूंजीवाद पर एक साथ कई नैतिक प्रश्न उठा रहे थे। दूसरा अहम मुद्दा यह भी है कि इस तरह के उत्पादन से ऊंची भर्ती को गंभीर क्षति पहुंचेगी और मानव अपने विकास की कब्र ही खोद डालेगा। इस तरह मानव प्रकृति को इस तरह पहुंचगा, जिसकी भविष्य में भरपाई कर पाना लगभग असंभव होगा। इस प्रक्रिया का तीसरा अहम बिंदु है, जिससे केंद्रीकृत उत्पादन की शुरुआत होगी। जिसका परिणाम यह होगा कि एक देश दूसरे देश पर, एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र पर और एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर पूरी तरह से निर्भर हो जाएंगे और पूरी तरह परतंत्रता सामने आ जाएगी। गांधी का मानना था कि स्वराज्य स्वतंत्रता के लिए स्वावलंबन पहली शर्त है। इसके बिना तो स्वतंत्रता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। तभी तो आज आधुनिक अर्थव्यवस्था अनैतिक दिशा में सरपट दौड़ लगा रही है। 10 गांधीजी सम केंद्र वृत्त की चर्चा करते थे, जहां हर एक व्यक्ति हर एक संस्था हर एक समाज और हर एक देश अपने पैर पर खड़ा हो सके। गांधीजी अंधाधुंध उद्योगों की स्थापना के साथ साथ मशीनीकरण का भी समर्थन नहीं करते थे। उनके मुताबिक, मशीनें केवल प्रदूषण ही नहीं पैदा करती हैं, बल्कि वे मानव के उत्पाद को मानव से दूर करने में भी अपना अहम भूमिका निभाती हैं। इस तरह से हम देखें तो मानव धीरे-धीरे पशुवत होने लगता है, क्योंकि श्रम करने में उसे आनंद आना बंद हो जाता है। इतना ही नहीं गांधी ने यह भी कहा कि मशीनों से बेतहाशा रोजगारी पड़ेगी और मानव मशीन मात्र बनकर रह जाएगा और साथ ही वह कई रोगों का शिकार भी हो जाएगा। यह भी समझना जरूरी है कि गांधी वहां तक मशीनों को स्वीकार करते थे, जहां तक मनुष्य के लिए वह सुख का कारण बनी रहे यानी वह व्यक्ति को कोई नुकसान न पहुंचा रही हो। गांधी की आलोचना का उत्तर आधुनिक अर्थव्यवस्था के समर्थक कुछ इस तरह देते हैं कि मानव जनसंख्या बीती शताब्दी में जिस गति से बढ़ी है, उसमें अगर मशीन का उपयोग नहीं होता तो मानव के लिए बेहद गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती। दूसरे, मशीनों ने मानव के लिए कई अच्छे काम भी किए हैं, जिससे मानव की ताकत और खुशी काफी हद तक बढ़ी है। कुछ लोगों को गांधी प्राचीन ख्याल के व्यक्ति लगाते हैं और मानव की आकांक्षाओं और आवश्यकताओं से परिचित हैं। ध्यान से देखा जाए तो गांधी की आलोचना “नहीं होता तो क्या होता” पर निर्भर है। इसमें गांधी ने आधुनिक अर्थव्यवस्था पर जो गंभीर नैतिक प्रश्न उठाए हैं, उनका कोई प्रत्युत्तर है ही नहीं। गांधी की अर्थव्यवस्था की समस्याओं का समाधान न्यासवाद में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। उनके अनुसार, उद्योगपति की भूमिका साधनों का मालिक नहीं, बल्कि न्यासी होना चाहिए। उन्हें संस्था में काम करने वाले लोगों को कार्य के आधार पर उचित बटवारा करना चाहिए न कि सारा लाभ या लाभ का अधिकार खुद ही अपने पास रखना चाहिए। गांधीजी का यह भी मानना था कि संपत्ति या प्रकृति पर किसी का अधिकार नहीं होना चाहिए। यह प्रकृति प्रदत्त चीजें हैं, जो ईश्वरीय देन हैं। लिहाजा इन पर सभी का समान अधिकार होता है। इस तरह से गांधी किसी भी व्यक्ति को मालिक स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन वे पूंजीपतियों या कहें उद्योगपतियों के हटाने के पक्ष में भी नहीं थे। वास्तव में गांधी पूरी तरह से समाजवादी थे, लेकिन उनका समाजवाद उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण से नहीं, बल्कि वितरण से जुड़ा हुआ है। उत्पादन की दृष्टि से समाजवाद नहीं है, लेकिन वितरण की दृष्टि से समाजवाद आवश्यक है। गांधी इसके लिए मार्क्सवादी हिंसा के ठीक विपरीत अहिंसक सत्याग्रह का मार्ग सुझा रहे होते हैं। तब वे पूरी तरह से भारतीय नैतिकता के मानदंडों पर खरा उतरते हुए नजर आते हैं, जिसमें पूंजीपतियों के अंदर परिवर्तन की समस्या का स्थाई समाधान देने की बात करते हैं। उनके मुताबिक बल प्रयोग करने या हिंसा से किसी समस्या का स्थाई हल नहीं हो सकता और दूसरे सामूहिक नियंत्रण में किसी न किसी व्यक्ति को बैठाना पड़ेगा और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जिसके पास अधिकार नहीं होगा, वह व्यक्ति शोषण नहीं करेगा। इस दृष्टिकोण से गांधी की प्रयोगशाला में भारतीय संदर्भ पर अभी भी होना बाकी है, जिससे अर्थव्यवस्था में नैतिकता के मानक स्थापित होने की पर्याप्त संभावनाएं छिपी हुई हैं।