अब शाख़ से टूटा हुआ पत्ता ही समझिए, मैं भी कभी आँधी, कभी तूफ़ान रहा हूँ |

हिंदुस्तान के सबसे उम्रदराज़, वरिष्ठ शायर जगदीश जैन साहब के 101 वें जन्म दिन पर 20 नवंबर को ‘हल्का – ए- तश्नागाने- अदब’ द्वारा अनुव्रत भवन, नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली एन.सी.आर से पधारे लगभग 50 शायरों ने जैन साहब को बधाई एवम शुभकामनाएं दीं। इस अवसर पर साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य अमृत’ की उपसंपादिका श्रीमती उर्वशी अग्रवाल उर्वी की मेजबानी में एक कवि गोष्ठी का भी आयोजन हुआ जिसका संचालन संस्था के सेक्रेटरी सीमाब सुल्तान पुरी साहब ने किया। नशिस्त में पढ़े गए चंद शे’र मुलाहिजा हों –

दरे-दिल पर मुसलसल हो रही है देर से दस्तक,
ज़रा ए दर्द उठकर देख, अबके मौत ही होगी |
-सीमाब सुल्तानपुरी

रू- ब- रू बुजुर्गों के सहमे सहमे रहने को,
एहतराम कहते हैं, खौफ़ डर नहीं कहते।

  • शकील शिफ़ाई

तड़पता देखकर बोला शिकारी,
निशाना चूक जाना चाहिए था।

  • दीक्षित दनकौरी

सच घिसटता है अपाहिज की तरह,
झूठ की रफ़्तार कितनी तेज़ है।

  • अब्दुल रहमान ‘ मन्सूर’

हम इतनी बार पहने जा चुके हैं,
हमारा दाम आधा हो चुका है |

  • अजय ‘अक्स’

अजीब मरहला है ये रह ए मुहब्बत में,
मेरा सुकूँ है वो जिसकी मैं बेकरारी हूं।

  • नीना सहर

हैं तेरे दिल में कई रास्ते औरों के लिए,
अब तेरे दिल से उतर जाने को जी चाहता है।

  • बेगम नसीम

रौशनाई हैं अगरचे ये हमारे आँसू,
दर्द उठता है तो काग़ज़ पे बहा लेते हैं|

  • आशीष सिन्हा ‘क़ासिद’

तू है ख़ुरशीद तो उसका भी सवेरा कर दे,
भर के आँखों में जो उम्मीद-ए- सहर जाता है |

  • मुजीब क़ासमी